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अधूरा था

मेरा ज्ञान

सर्वभक्षी के बारे में

मै जानता था

केवल अग्नि है सर्व भक्षी


मगर

सब कुछ खाते थे वे

सांप, झींगुर,कीट –पतंग

यहाँ तक कि चमगादड़ भी

असली सर्वभक्षी तो ये थे

इन्हें पता था

प्रकृति लेती है बदला

पर उन्हें भरोसा था

कि वे बदल देंगे

अपने ज्ञान-विज्ञान से

विनाश की दशा और गति

पर जब हुआ

विनाश का तांडव्

फिर कोई न बचा पाया

और न कोइ बचा

सारा विश्व कर उठा त्राहिमाम

सांप

और चूहों की तरह

लोग दुबकने लगे

अपनी साँसे रोक

उस घरनुमा बिल में

जहां वे समझ सकते थे

खुद को महफूज

तब मसीहा

घूम रहे थे बेख़ौफ़

हर सड़क पर हर गली में

देख रहे थे

विनाश की लीला

और कालचक्र में फंसे

छटपटाते मनुष्य को

वे हँसते थे

अपना हुनर

अपनी महारत दिखाते थे

और थूक देते थे

बेबश इंसान के मुख पर

(मौलिक / अप्रकाशित )

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Comment by नाथ सोनांचली on April 26, 2020 at 1:23am

आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन भाव पूर्ण और सोचने को विवश करती उत्तम रचना पर आपको बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 22, 2020 at 4:14pm

आ. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन । अच्छी समसामयिक रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

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