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Ravi Shukla's Blog (25)

ग़ज़ल : घर चलो अब वक्‍त है आराम का

रंग गहरा हो गया है शाम का ।

घर चलो अब वक्‍त है आराम का ।।

आज उनको याद मेरी आ गई ।

कल तलक मैं था नहीं कुछ काम का ।।

घर चलो दहलीज़ होगी मुन्तजि़र ।

फि़क्र में गुज़रे न वक्फा़ शाम का ।।

खो न जाना इन नज़ारों में कहीं ।              

ये फुसूं है चर्खे  नीली फ़ाम का ।।

जब पड़ा था काम उनको याद था ।

अब पडा़ हूं जब नहीं  कुछ काम का ।।

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Ravi Shukla on August 10, 2015 at 6:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

कभी कोई मु‍फलिस कहां बोलता है ।

जो बोले तो फिर आसमां बोलता है ।।

ज़माना नहीं, पासबां बोलता है ।

हुआ कौन उसका, मकां बोलता है ।।

अभी लोग  उठकर रवाना हुए हैं ।

ये चूल्‍हों से उठता धुआं बोलता है ।।

 

अगर आंच गैरत पे आये तो बोले ।

वगरना कहां बेजुबां बोलता है ।।

 

दिलासा नहीं काम दे दो मुझे तुम ।

यही बात बोले जहां बोलता है ।।

जमीं उसकी दहकान से…

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Added by Ravi Shukla on August 5, 2015 at 1:30pm — 14 Comments

ताज़ा ग़ज़ल : टूट के कर गया आशियां दर ब दर

बह्र  212 212 212 212

टूट के  कर गया आशियां दर ब दर

घूमते फिर रहे हम यहां दर ब दर

 

आ गये  लौट कर अक्‍ल वाले सभी    

पर जुनूं में हुए लामकां दर ब दर

 

कमसिनी छोड़कर अब महकने लगे 

जख्‍म मेरे हुए बेकरां दर ब दर

 

खाल में भेड़ की भेडि़ये घुस गये

मर गये मेमने बकरियां दर ब दर

 

हो सकी क्‍या हमें खुद हमारी सनद

फिर रहा आदमी बेनिशां दर ब दर

हम कहां से चले थे कहां आ गये

कर…

Continue

Added by Ravi Shukla on July 29, 2015 at 6:00pm — 10 Comments

एक ग़ज़ल - सुधिजनो द्वारा परिमार्जन हेतु

खूब सूरत है नज़ारे क्‍या करें

गुरबतों के लोग मारे क्‍या करें

 

सो गए फुटपाथ पर जोखिम मगर

नींद जो उनको पुकारे क्‍या करें

 

साल मे इक माह मिलती छुट्टियां

चॉंद को गर ना निहारे क्‍या…

Continue

Added by Ravi Shukla on July 28, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

जाति आधारित जनगणना : कुछ दोहे

राष्‍ट्र वाद पर हो रही, जाति वाद की मार ।

ज़हर  घोलने के  लिये, सहमत है  सरकार ।।

 

ज़हर जाति का कर रहा, जनमत पूर्व प्रचार ।

भला  नहीं  आवाम  का,  डालेगी  ये  रार ।।

 

जनगणना के आंकड़े, नहीं राष्‍ट्र अनुकूल ।

भूल गये इतिहास क्‍यूँ , बंग भंग का मूल ।।

 

जांत पांत की धारणा, संख्‍या सोच अजीब ।

निर्धनता से जूझ कर , संभला कहां गरीब ।।

जाति प्रथा का नाश हो, सबकी इक पहचान ।

भारत के सब नागरिक, सारे है इन्‍सान…

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Added by Ravi Shukla on July 20, 2015 at 4:30pm — 8 Comments

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