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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 188 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

बार का मिसरा मरहूम शायर जौन एलिया साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।
तरही मिसरा है:
“आदमी आदमी को भूल गया”
बह्र 2122, 1212, 112/22 अर्थात् फ़ायलातुन्, मफ़ायलुन्, फ़यलुन् है।
रदीफ़ है “को भूल गया” और क़ाफ़िया है ‘ई’ का स्वर
क़ाफ़िया के पर्याप्त उदाहरण दी गयी मूल ग़ज़ल में ही हैं।


मूल ग़ज़ल एक उदाहरण है कि मशहूर शायर भी लंबी ग़ज़ल कहते रहे हैं। महत्वपूर्ण यह होता है कि शेर जैसे शेर होंए ऐसा न लगे कि संख्या भर है।

मूल ग़ज़ल यह है:
ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया
मैं तो उस ज़ख़्म ही को भूल गया।


ज़ात-दर-ज़ात हम-सफ़र रह कर
अजनबी अजनबी को भूल गया।


सुब्ह तक वज्ह-ए-जाँ-कनी थी जो बात
मैं उसे शाम ही को भूल गया।


अहद-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं
वज्ह-ए-वाबस्तगी को भूल गया।


क्यूँ न हो नाज़ इस ज़ेहानत पर
एक मैं हर किसी को भूल गया।


सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं
बहस क्या थी उसी को भूल गया।


सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है
आदमी आदमी को भूल गया।


क़हक़हा मारते ही दीवाना
हर ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गया।


ख़्वाब-हा-ख़्वाब जिस को चाहा था
रंग-हा-रंग उसी को भूल गया।


क्या क़यामत हुई अगर इक शख़्स
अपनी ख़ुश-क़िस्मती को भूल गया।


सोच कर उस की ख़ल्वत-अंजुमनी
वाँ मैं अपनी कमी को भूल गया।


सब बुरे मुझ को याद रहते हैं
जो भला था उसी को भूल गया।


उन से वा'दा तो कर लिया लेकिन
अपनी कम-फ़ुर्सती को भूल गया।


बस्तियो अब तो रास्ता दे दो
अब तो मैं उस गली को भूल गया।


उस ने गोया मुझी को याद रखा
मैं भी गोया उसी को भूल गया।


या'नी तुम वो हो वाक़ई..? हद है
मैं तो सच-मुच सभी को भूल गया।


आख़िरी बुत ख़ुदा न क्यूँ ठहरे
बुत-शिकन बुत-गरी को भूल गया।


अब तो हर बात याद रहती है
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया।


उस की ख़ुशियों से जलने वाला 'जौन'
अपनी ईज़ा-दही को भूल गया।


मुशायरे की अवधि केवल दो दिन होगी । मुशायरे की शुरुआत दिनांक 25 फरवरी दिन बुधवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 26 फरवरी दिन गुरुवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

नियम एवं शर्तें:-

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |

एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |

तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |

शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |

ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |

वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें

नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |

ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

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मंच संचालक

तिलक राज कपूर

(वरिष्ठ सदस्य)

ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

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Replies to This Discussion

 ‘अम्न का ख़्वाब रात में देखा’ में भी दोष है, यह शेर कुछ ऐसे हो सकता है। 

अम्न का ख़्वाब देखकर मैं क्यूँ
खुद उसे रात ही को भूल गया

आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन इस्लाह से नवाज़ा है कि ग़ज़ल निखर गयी है बहुत शुक्रिया आपका! इस्लाह के बाद संशोधित ग़ज़ल तुरंत पोस्ट करता हूँ 

आदरणीय जयहिंद जी नमस्कार 

अच्छी ग़ज़ल कही आपने बधाई स्वीकार कीजिए

गुणीजनों ने खूब सुझाव दिए मुझे भी सीखने को मिला 

ग़ज़ल निखर जाएगी

सादर 

आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का 

अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर

क्या करुँ रात ही को भूल गया 

क्या गिला गर किसी को भूल गया

इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया

अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर

क्या करुँ रात ही को भूल गया

भूलकर याद मुझको आया है

तुझ से मिल के सभी को भूल गया

जाने क्या था निगाह ए साक़ी में

मय भी मय- ख़ानगी को भूल गया

याद तो मौत सी मुअय्यन थी

बस यही दो घड़ी को भूल गया

क्या मिला है ज़हीन होने से

'आदमी आदमी को भूल गया'

2122, 1212, 112
**
बिसलरी पा  नदी को भूल गया
हर अधर तिस्नगी को भूल गया।१।
*
पथ की हर रौशनी को भूल गया
साथ ही  रहबरी  को  भूल गया।२।
*
जिसके गम में खुशी को भूल गया
क्या गजब वह मुझी को भूल गया।३।
*
जख्म दिल का अभी भरा भी नहीं
पर मैं  उसकी  बदी  को भूल गया।४।
*
मित्र मुझको बहुत मिले हर पग
जब कभी दुश्मनी को भूल गया।५।
*
दिल किया तो झुका लिया सर यूँ
बन्दगी  में  खुदी  को  भूल  गया।६।
*
पाप करने  पे  आ गया जब मैं
रब की मौजूदगी को भूल गया।७।
*
ढेर दौलत जो आ गयी सम्मुख
"आदमी, आदमी को भूल गया।८।"
*
साँझ ढलते  ही  चाँदनी  भायी
दिन चढ़ा चाँदनी को भूल गया।९।
*
अब  'मुसाफिर'  कहाँ  रहा  मैं भी
पथ से जब दिल्लगी को भूल गया।१०।
*
*
मौलिक/अप्रकाशित

प्रिय लक्ष्मण भाई, अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई। 

//पाप करने पे आ गया जब मैं
रब की मौजूदगी को भूल गया।

//साँझ ढलते ही चाँदनी भायी
दिन चढ़ा चाँदनी को भूल गया

दोनों शेरों का संदेश बहुत अच्छा लगा। उत्तम विचार हुए है। 

सादर 

आ. भाई अजय जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

आदरणीय लक्ष्मण जी नमस्कार 

अच्छी ग़ज़ल कही आपने बधाई स्वीकार कीजिए

सादर

आ. रिचा जी, हार्दिक धन्यवाद।

खूबसूरत ग़ज़ल हुई। इस पर विचार कर सकते हैं।

पथ की हर रौशनी को भूल गया (राह की रौशनी को भूल गया)
साथ ही  रहबरी  को  भूल गया।२। (जो तेरी रहबरी को भूल गया, सूफ़ियाना हो जायेगा)

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