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नवगीत/दोहा गीत: पलाश... संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत/दोहा गीत:

पलाश...

संजीव वर्मा 'सलिल'

*

बाधा-संकट हँसकर झेलो

मत हो कभी हताश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता यही पलाश...

*

समझौते करिए नहीं,

तजें नहीं सिद्धांत.

सब उसके सेवक सखे!

जो है सबका कांत..

परिवर्तन ही ज़िंदगी,

मत हो जड़-उद्भ्रांत.

आपद संकट में रहो-

सदा संतुलित-शांत..

 

शिवा चेतना रहित बने शिव

केवल जड़-शव लाश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता यही पलाश...

*

किंशुक कुसुम तप्त अंगारा,

सहता उर की आग.

टेसू संत तपस्यारत हो

गाता होरी-फाग..

राग-विराग समान इसे हैं-

कहता जग से जाग.

पद-बल सम्मुख शीश झुका मत

रण को छोड़ न भाग..

जोड़-घटाना छोड़,

काम कर ऊँची रखना पाग..

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता यही पलाश...

****

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 21, 2011 at 9:54pm

शब्द-भाव-विचार समृद्ध रचना.

 

//शिवा चेतना रहित बने शिव

केवल जड़-शव लाश.//...

सौंदर्य-लहरी की सम्पूर्णता बखूबी निखर आयी है. साधु-साधु.. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 16, 2011 at 10:45am
आचार्य जी, बहुत ही सार्थक और संदेशपरक रचना है यह, दोहे को गीत के रूप मे गुनगुनाना बहुत ही खुबसूरत लगा | बधाई स्वीकार करें इस शानदार अभिव्यक्ति पर |

कृपया ध्यान दे...

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