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‘वन्दना’
हंस शोभित वीणा पाणिनि वेद गरिमा गायिनी माँ
नवित- नव रस, नवल पद- मय, चन्द्र सी छवि छायिनी माँ ।

पूर्ण शशि की अल्पना तुम, मुकुट ललिता मात मेरी,
अर्चना का दीप हो माँ इस जगत की आप प्रहरी ।
हंस शोभित वीणा पाणिनि वेद गरिमा गायिनी माँ,
नवित- नव रस, नवल पद- मय,चन्द्र सी छवि छायिनी माँ ।

मुझ अकिचंन को, चला दो विश्व के कल्याण पथ पर,
नव धवल शुचि शक्ति संग,निकलूं सदा निर्वाण रथ पर ।
बन अजेय माँ मै बजाऊ, नित तेरी हर प्रात भेरी ,
अर्चना का दीप हो माँ इसे जगत की आप प्रहरी ।

नीत और परतीत के घर-घर सुमन सुरभित खिलें,
सरस-मकरन्दी पवन झोकें सदा पल पल चलें ।
ना पतझरी आभास भी अब चढ सके किसी द्वार देहरी,
अर्चना का दीप हो माँ,इस जगत की आप प्रहरी ।

ज्ञान दीपक बुझ रहा है, मात इसे सुधार देना,
हो प्रकाशित सब दिशाऐं एक शुचि आधार देना ।
छंद, गति -लय नवल नवद्या भक्ति में अनुरक्ति मेरी,
अर्चना का दीप हो माॅ इस जगत की आप प्रहरी ।

हंस शोभित वीणा पाणिनि वेद गरिमा गायिनी माँ,
नवित -नव रस नवल पद -मय चन्द्र सी छवि छायिनी माँ ।

कमल विहारिणी पु-नीता सुन्दर मात तू
काम की शक्ति कर्म, मर्म की प्रकाशिनी।

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 9, 2011 at 9:24am
सुंदर वंदना की प्रस्तुति है यह , बहुत ही खुबसूरत, भावपूर्ण और भक्तिमय अभिव्यक्ति पर साधुवाद स्वीकार करे चंद्रप्रकाश जी |

कृपया ध्यान दे...

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