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आज ना जाने
क्यों सहमी हुईं
है दीवारें
गरम
चाय का प्याला
लिया
ठंडी हवा का
लुत्फ़ लिया
देखा चाँद
की ओर
सब कुछ
स्याह सा लगा
काले बादल
इधर उधर
बिखरने को
मचल रहे थे
तेज़ हवाएँ
बेलगाम
चलने लगी
काँच की
खिड़की भी
छटपटाने
तड़पने लगी
तेज़ी से बिजली
चटकी
चादर में
मैं सिमट गयी
बुझी हुई
आँखों से
फिर देखा
दीवार की
तरफ़
दरारें बे हिसाब
थी काँप
रही थी
पपड़ी भी
दीवारें
को डर था
बस गिर
जाने का और
एक अरसा मिट
जाने का
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2016 at 9:31am

आदरणीया दीपू जी , कविता आपकी अच्छी लगी , हार्दिक बधाइयाँ ।   दीवारों को डर था ,  सही नही होगा क़्या ?

कृपया ध्यान दे...

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