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बाज आता नहीं सिखाने से-ग़ज़ल

2122 1212 22

जाके कह दीजिए ज़माने से
वक़्त छीने कमाने खाने से

यूँ समस्याएं खत्म क्या होंगी
सिर्फ़ इल्ज़ाम भर लगाने से

काम सरकार ग़र नहीं करती
किसने रोका है कर दिखाने से

बैठ टेली विज़न के आगे यूँ
दिन बहुर जाएगा न गाने से

खुद को बदले बिना न रुक सकता
पाप बस शोर यूँ मचाने से

मुद्दे ऐसे तो हल नहीं होंगे
राग-ढपली अलग बजाने से

देश खुद ही प्रगति के पथ होगा
भार हर एक के उठाने से

मानता ही नहीं कभी पंकज
बाज आता नहीं सिखाने से

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2016 at 7:28pm
आदरणीय गिरिराज सर बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2016 at 7:28pm
आदरणीय सौरभ पांडेय सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2016 at 7:28pm
आदरणीय सुरेश जी सादर आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 1, 2016 at 9:53pm

आदरणीय पंकज भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 29, 2016 at 6:50pm

बढिया कोशिश हुई है। बधाई स्वीकारिये।

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 29, 2016 at 6:21pm
आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी इस खूबसूरत गजल पर हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by Samar kabeer on August 29, 2016 at 2:32pm
जी,ये ठीक है ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 29, 2016 at 11:24am
फिर बाऊ जी कहूँगा
Comment by Samar kabeer on August 28, 2016 at 10:59pm
भाई आपकी मुहब्बतों का बहुत बहुत शुक्रिया,इस के अलावा आप ओबीओ पर देखेंगे कि सब गुरु हैं और सब चेले ,मेरी गुज़ारिश है कि आप अगर ये तख़ातुब नहीं रखना चाहते तो कोई और रख लें,लेकिन गुरू जी न कहें ,यहाँ हम सब एक परिवार की तरह हैं,और एक परिवार में जो रिश्ते क़याम हो सकते हैं वही रहना चाहिये ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 28, 2016 at 9:05pm
आदरणीय रक्ताले सर प्रणाम। आप लोगों का स्नेह मुझ पर यूँ ही बना रहे बस, आगे मैं कुछ अच्छी गज़लों का वादा करता हूँ, आशीर्वाद दीजिये कि वादा निभा पाऊँ।

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