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बिलखते हैं बच्चे , सिसकती हैं माएँ मनाएं भला जश्न कैसे बता दो------------ग़ज़ल

122 122 122 122 122 122 122 122
अभी जाने कितने घरों में न चूल्हा
न जाने ही कितनों के घर, ये तो जानो।
बहुत कीमती फोन हाथों में लेकर
वो नेता बताता दिखा मीडिया को।।1।।

सफेदी थी झक्कास गाड़ी गज़ब की
सफ़ारी थी शायद औ मॉडल नया था।
गरीबी पे व्याख्यान देकरके जिसमें
मसीहा गरीबों का चढ़कर गया, वो।।2।।

परिस्थिति पे घड़ियाली आँसू बहाकर
तसल्ली बहुत दे गया था जो नेता।
मदद को बुलाया था आवास पर ही
मिटाये कहाँ दाग मन पर दिया , जो।।3।।

कूड़े की गाड़ी में छिपकर के भूखा
युवक ब्रेड के टुकड़े खाता दिखा है।
तो पंकज को थाली के पकवान सारे
ज़हर लग रहे हैं, मन रो पड़ा लो।।4।।

बताएँ भला खुद को संभ्रांत कैसे
लिखा जाये जबकि अपने हैं भूखे।
बिलखते हैं बच्चे , सिसकती हैं माएँ
मनाएं भला जश्न कैसे बता दो।।5।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2016 at 1:17am
हाँ सर, क्षमा कीजियेगा, मत्ले का शेर तो है ही नहीं।

पुनः क्षमा प्रार्थना,सादर
Comment by Samar kabeer on August 20, 2016 at 10:21am
बह्र ठीक है,और क़ाफ़िए 'को' 'लो' 'जो'हुए,लेकिन मतला के दो मिसरे कौन से हैं,मैने ऐसी ग़ज़ल पहली बार पढ़ी है ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 19, 2016 at 9:07pm
आदरणीय समर सर ये ग़ज़ल (ग़ैर रदीफन) ही है, क्योंकि-

1. ये बह्र में है
2. इसमें काफ़िया निभाया गया है।
3. इसमें कथ्य भी है

ग़ज़ल के नियमों का ये सुनिश्चित अनुपालन कर रही है।

इसलिए ये ग़ज़ल है

शेष आप श्रेष्ठ जनों का मार्गदर्शन अपेक्षित है
Comment by Samar kabeer on August 19, 2016 at 8:16pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब, क्या ये ग़ज़ल है ?

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