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विभक्त चिड़िया (लघुकथा)

नीलामी में चित्र उस व्यक्ति ने खरीद ही लिया, उस चित्र का सौन्दर्य ही कुछ ऐसा था कि उसकी नीलामी में देश के कई बड़े नेता, उद्योगपति, शिक्षाविद, कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी आये थे|

उसने धन देकर चित्र हाथ में लिया और देखा| एक हरे-भरे बगीचे की आकृति देश के मानचित्र के समान थी, बगीचे में एक हाथ में पुस्तक लिए कुछ शिक्षाविद थे, एक हाथ में सफ़ेद झंडे फहराते कुछ बच्चे थे, कुछ उद्योग थे जिनकी गगनचुम्बी चिमनियाँ थी, कुछ धनवान धन बाँट रहे थे, आकाश में सूर्योदय के केसरिया-नारंगी रंग की छटा बिखरी हुई थी और अपने दूसरे हाथ में सभी ने एक डोरी पकड़ी हुई थी जिससे एक उड़ती हुई चिड़िया को थाम रखा था| सुनहरे रंग की सुंदर चिड़िया का एक पंख आकाश में तो दूसरा पंख बगीचे को छू रहा था|

उस चित्र को वह कुछ क्षण देखता रहा, फिर  उसने चित्र को फ्रेम से बाहर निकाला और केंची लेकर चित्र के दो भाग कर दिए, पक्षी को आसमान और धरती के बीच से काट दिया|

सब हतप्रभ थे, चित्रकार भागा-भागा आया और हक्का-बक्का होकर पूछा, "ये क्या किया आपने? इसलिए आपने इसे खरीदा था?"

उस व्यक्ति ने ना में सिर हिला दिया और कहा, "मैं भी इस सोने की चिड़िया से बहुत प्रेम करता हूँ, लेकिन यहाँ सब कुछ दो भागों में बंटा हुआ है, हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से भेद करता है, कभी सम्प्रदाय के नाम पर, तो कभी जाति - रंग - भाषा - शिक्षा - धन - शक्ति के नाम पर| चिड़िया दो भागों में विभक्त होकर कोयला हो रही है|"

यह कह कर वह बाहर निकल गया|

वहीँ खड़े एक उद्योगपति ने पूछा, "ये पागल कौन था?"

"इस चिड़िया का पुराना मालिक, भारत..." एक बुद्धिजीवी दार्शनिक ने उत्तर दिया|

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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Comment by TEJ VEER SINGH on March 16, 2016 at 12:19pm

हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

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