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लघुकथा-थप्पड़/कल्पना रामानी

अपने बच्चों को सिंकते हुए भुट्टे और बिकते हुए जामुनों  को ललचाई नज़रों से देखते हुए वो मन मसोस कर रह जाती थी। आज उसे तनख़्वाह मिली थी, उसके हाथों में पोटली देख कोने में खेलते हुए दोनों बच्चे खिलौने छोड़ दौड़ पड़े। तभी बीड़ी पीते हुए पति ने उससे कहा-“ला  पैसे, बहुत दिनों से गला तर नहीं हुआ”... “लेकिन आज मैं बच्चों के लिए...” “तड़ाक!..."  "तो तू मेरे खर्च में कटौती करेगी?” पोटली जमीन पर गिरी, जामुन  और भुट्टे मैली ज़मीन सूँघने लगे और... माँ पर पड़े थप्पड़ से सहमे हुए बच्चे अपना गाल सहलाते हुए पुनः अपने टूटे-फूटे खिलौनों के साथ कोने में दुबक गए।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by savitamishra on August 11, 2014 at 4:21pm

बहुत खुबसुरत दी ..सादर नमस्ते

Comment by कल्पना रामानी on July 10, 2014 at 6:50pm

उत्साह वर्धन के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 9, 2014 at 6:04pm

एक ऐसी घटना को शब्द मिला है जो ऐसे परिवारों में आम हुआ करती है.

गरीबी, दारू, अतार्किक हठ, सहमा बचपन और प्रताड़ित पत्नियाँ.. एक ऐसा समुच्चय बनाता है जो समाज का अभिशप्त रूप है.

प्रस्तुति के लिए धन्यवाद आदरणीय़ा

Comment by कल्पना रामानी on July 7, 2014 at 10:26pm

लघुकथा आपको अच्छी लगी, मन हर्षित हुआ, हार्दिक धन्यवाद प्रिय बृजेश जी

Comment by बृजेश नीरज on July 7, 2014 at 8:39pm

मार्मिक लघु कथा! आपके शब्दों ने दृश्य को बखूबी उभारा है! आपको बहुत-बहुत बधाई!

Comment by कल्पना रामानी on July 4, 2014 at 10:47pm

आदरणीय शुभ्रांशु जी, आपने रचना के कमजोर बिन्दु की ओर ध्यान आकर्षित करवाया इसके लिए बहुत धन्यवाद। मेरा इस तरफ ध्यान ही नहीं गया। संशोधन तो करना ही पड़ेगा।/सादर

Comment by कल्पना रामानी on July 4, 2014 at 10:36pm

 आदरणीय शुभ्रांशुजी,  विजय शंकरजी,    जितेंद्र जी, प्रमोद श्रीवास्तवजी  लक्ष्मण लड़ीवाला जी   गोपाल नारायण जी,प्रियंका जी , राजेश कुमारीजी, सविता जी, मंजरी जी, लघुकथा पर आप सबकी सराहना से मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। आप सबका सादर धन्यवाद  

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 4, 2014 at 8:34pm
कहीं भी सही जगह होते अपनी इस हरकत पर बिलकुल सही जगह होते , यहां तो आपने हीरो ( कहानी का नायक ) बना दिया , वैसे भुट्टेवाली ही क्यों हर सामाजिक स्तर में ऐसे हीरो मिल जाते हैं , जो देते कुछ हैं नहीं छीन और लेते हैं .
मार्मिक चित्रण के लिए बधाई .
Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:37pm
आदरणीया सुन्दर लघुकथा के लिए बधाई
Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on July 3, 2014 at 7:12pm

bahut marmik kath . badhaai

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