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कविता :- हर ले वीणा वादिनी !

कविता :- हर ले वीणा वादिनी !

देश को लूट कर
हक़ हकूक छीन कर
जो बने हैं बड़े
और तन कर खड़े
बेशर्म बेहया
उन दरख्तों के पत्ते और सत्ते ओ माँ !
उनकी धूर्त और मक्कार शाखाएं भी
तू हरले सभी !
तू हरले सभी !!

इसी साल निकली है दिल से दुआ
देश के हाल किस हाल हैं देख ले
देखले कि पुजारी हैं किस हाल में
अब कलम खून के आंसू रोने लगी
सम्पदा ही की सत्ता है माँ हर तरफ
हर ले हुस्नो और नीरो की सब तू हनक
हर ले जारों की सत्ता में डूबी सनक
बीज क्रांति के बो दे तू अबकी बरस
देश के आखिरी जन में जागे हरस
बीज क्रांति के बो दे तू अबकी बरस !!!!!

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Comment by Abhinav Arun on February 9, 2011 at 7:37am
आदरणीया वंदना जी एवं रंजना जी तथा सर्वश्री राकेश जी एवं बागी रचना पसंद की आपने , आभारी हूँ | हम सब की अर्चना मा वीणावादिनी अवश्य सुनेंगी ऐसी उम्मीद है |
Comment by रंजना सिंह on February 8, 2011 at 3:43pm
asankhya hridayon की guhaar आपने shabdon में goonth maata को arpit किया है...

mata se prarthna है ki हमारे कष्टों को harte hue hamara uddhaar karen,hame sadbuddi den....

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2011 at 2:15pm
बेहद खुबसूरत रचना , माँ सरस्वती आपकी मनोकामना पूर्ण करे, बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई स्वीकार करे अरुण भाई |

कृपया ध्यान दे...

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