For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

भक्तों के मुख मलिन हैं ,पूजा-गृह में गर्द ,

प्रभु अपने किससे कहें देव-भूमि का दर्द !

हुई न ऐसी त्रासदी जैसी है इस बार ,

प्रभु ने झेली आपदा बदरी क्या केदार !

बादल,बारिश,मृत्यु के कारण बने पहाड़ ,

धरती काँपी,मनुज के थर-थर काँपे हाड़ !

पाहन के भगवान जी ,विपदा पत्थर संग,

भक्तों ने खुद ही लड़ी खूब मौत से जंग !

श्रद्धा इनकी देखिये ,कितने भक्त महान,

हर कि पैडी पर हुआ  कीचड़ में ही स्नान !

_______________प्रो .विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )

Views: 629

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Savitri Rathore on June 27, 2013 at 2:46pm

समसामयिक रचना के लिए हार्दिक बधाई,साथ ही सुन्दर छंद विधान !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 27, 2013 at 11:06am

सामयिक और सार्थक दोहे | वाह ! बहुत खूब दिल से हार्दिक बधाई आदरणीय श्री विशम्भर शुक्ल जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 26, 2013 at 6:48pm
सम-सामयिक दोहों के लिए हृदय से बधाई, आदरणीय विश्वम्भरजी. भावनाओं को तार्किकता के साथ अभिव्यक्ति मिली है.

सादर
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 25, 2013 at 9:13pm

भक्तों के मुख मलिन हैं ,पूजा-गृह में गर्द ,

प्रभु अपने किससे कहें देव-भूमि का दर्द !

आदरणीय विश्वम्भर शुक्ल जी , सादर अभिवादन !

इस त्रासदी की कोई तुलना नहीं जहाँ भक्त और भगवान एक साथ ब्यथित हुए हैं 
Comment by annapurna bajpai on June 25, 2013 at 8:53pm

आदरणीय विशम्भर जी प्रभु के दर्द को  बड़े ही अच्छे ढ़ग से बयान किया है । बहुत आभार

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 25, 2013 at 8:20pm

आ0 विश्वम्भर सर जी,  बहुत ही दर्दनीय चित्रण सहित सुन्दर दोहे रचे है।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  किन्तु अन्तिम दोहा एक बार फिर से देख लें।  सादर,

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 25, 2013 at 1:15pm

आदरणीय बहुत ही सुन्दर एवं उत्तम दोहे रचे हैं, सुन्दर सत्य सटीक दोहों हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by वेदिका on June 25, 2013 at 1:09pm

यही श्रद्धा चेतना बन जाये तो त्रासदी को मिटीगेट करने में बल मिले।

 सार्थक रचना परबधाई   

Comment by Shyam Narain Verma on June 25, 2013 at 10:44am
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.....................
Comment by D P Mathur on June 25, 2013 at 9:12am

आदरणीय सादर नमस्कार , हिन्दू धर्म की जड़ें इतनी गहरी है , ये एक त्रासदी उसे हिला नही सकती अच्छे दोहों के लिये धन्यवाद !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service