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सरसों तू क्यों फूली-फूली है, सरसो कि मधुमास रसी!
आमन के बिरवा बौराये गये,फगुआ बयार पगलाये रही।।
पीली-पीली सरसों हरषों ज्यों फगुआ बयार हरहराये रही।
धरती के सूनी आॅचल में बसन्त बनो मुस्कराये रही।।

भौंरे गुंजन कर गाये रहे कलियाॅ-तरूणी इठलाये रही।
पवन मलय मद गंध पिेये,बहकाय तू मस्त झूम रही।।
कोयलिया कूक फिरै वन मा,विरहणियाॅ कन्तन खोज रही।
बगिया फूलन की बेल चढ़ी, पुष्पवाण जियन को भेद रही।।
के पी सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2013 at 1:28pm

आदरणीय श्रीयोगी सारस्वत जी, आपका आशय  समझ में नहीं आया! कृपया कुछ स्पष्ट करें ताकि गलतियां सुधारी जासकें! धन्यवाद

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2013 at 1:16pm

आदरणीय श्री सतवीर वर्मा विरकाळी जी, बहुत बहुत धन्यवाद! 

Comment by Yogi Saraswat on March 14, 2013 at 12:02pm

पीली-पीली सरसों हरषों ज्यों फगुआ बयार हरहराये रही।
धरती के सूनी आॅचल में बसन्त बनो मुस्कराये रही।। भौंरे गुंजन कर गाये रहे कलियाॅ-तरूणी इठलाये रही।
पवन मलय मद गंध पिेये,बहकाय तू मस्त झूम रही।।

पीली-पीली सरसों हरषों ज्यों फगुआ बयार हरहराये रही।
धरती के सूनी आॅचल में बसन्त बनो मुस्कराये रही।। भौंरे गुंजन कर गाये रहे कलियाॅ-तरूणी इठलाये रही।
पवन मलय मद गंध पिेये,बहकाय तू मस्त झूम रही।।

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 3:57pm
आ॰ केवल प्रसाद जी, बसन्त पर आपकी मनभावन कविता बहुत ही सुन्दर लगी, आभार।

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