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ग़ज़ल - अदब से सिरों का झुकाना ख़तम

ख़ुशी का हँसी का ठिकाना ख़तम,
घरों में दियों का जलाना ख़तम,

बड़ों के कहे का नहीं मान है,
अदब से सिरों का झुकाना ख़तम,

कहाँ हीर राँझा रहे आज कल,
दिवानी ख़तम वो दिवाना ख़तम,

नियत डगमगाती सभी नारि पे,
दिलों का सही दिल लगाना ख़तम,

गुनाहों कि आई हवा जोर से,
शरम लाज का अब ज़माना खतम,

मुलाकात का तो समय ही नहीं,
मनाना ख़तम रूठ जाना ख़तम,

जुबां पे नये गीत सजने लगे,
पुराना सुना हर तराना ख़तम.....

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by upasna siag on January 24, 2013 at 3:55pm

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 22, 2013 at 12:07am

कुछ शेर पसंद आये तो कुछ भर्ती के लगे. बह्र निभाने की कोशिश में शब्दों की अक्षरी में बदलाव न हो. आखिरी शेर तार्किक रूप से स्वीकारा नहीं जा रहा है. पुराने तरने ही तो स्वर्ण-ध्वनि हैं, भाई.!

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