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क्रोध

 

अशांत करता है,परेशान करता है,

पटरी पर चल रही जिंदगी को,

पटरी से उतार देता है, क्रोध ।

 

बुद्धि नष्ट करता है,ज्ञानहीन बनाता है,

संयम को नष्ट करके,

गरिमा को खत्म करता है, क्रोध ।

 

बना काम बिगाड़ता है,संबंध खराब करता है,

वर्षों की मेहनत को क्षण में बरबाद करता है,

प्रेम में जहर भर देता है, क्रोध ।

 

हृदय जलाता है,रोग पैदा करता है,

तनाव बनकर शरीर नष्ट करता है,

खुशी और सुख का दुश्मन है, क्रोध ।

 

अकेलापन देता है,अभिमान उत्पन्न करता है,

आँखों में काली पट्टी बाँध देता है,

विवेक का दुश्मन है ,क्रोध ।

 

क्षण भर में आता है,कई घंटे रहता है,

पूरे दिन की ऊर्जा को खा जाता है,

मन को दुखी कर देता है ,क्रोध ।

 

लोभ,लालच से उत्पन्न होता है,

मनुष्य को तेजहीन बनाता है,

लोकप्रियता छीनता है, क्रोध ।   

 

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Comment

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Comment by seema agrawal on December 21, 2012 at 7:29pm

क्रोध के दुर्गुणों को बखूबी गिनाया अखिलेश जी 

पर क्या इसमे काव्य तत्व  हैं ?

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 21, 2012 at 11:32am

मित्र क्रोध की सुन्दर परिभाषा व्यक्त की है बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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