बहुत कुछ हमने पढ़ा है किताबों में
ज़िंदगी मगर नहीं समातीहै बाबों में
इत्मीनान हुए तो बेचैन हो उठे हम
सुकूंकी आदत होगई है इज्तेराबों में
बेपर्दा हुएतो पहचान न पाए तुमको
जोभी देखाहै वो देखा है हिजाबों में
तुम गएतो खराबातेइश्क उजड़ गया
नशा अब कहाँ बाकी रहा शराबों में
कारिज़ थे जो तेरे होगए हैं कर्ज़दार
न जाने चूक कहाँ होगई हिसाबों में
हमें धोखामिला उनसे जोथे मोतेबर
तुम सबात ढूँढते हो खानाखराबों में
चाहाकि छूके देखें पे हैफ ये ज़मीर
हम उलझके रहगए अज़ाबोसवाबोमें
राज़ वो गए बज़्म से क्या ढूँढते हो
खुश्बू हवा लेगई क्यारहा गुलाबों में
© राज़ नवादवी
भोपाल, संध्याकाल ०८.०९, २६/०६/२०१२
Comment
धन्यवाद भाई अरुण एवं उमाशंकर जी जो आपने पढाने के ज़हमत उठाई!
- राज़ नवादवी
खूबसूरत हास्य गज़ल
शुक्रिया राजेश कुमारी जी आपकी दादोतहसीन और हौसलाअफजाई का! हमें भी आप सबों का सुखद साथ मिला है ओबीओ पर!
बेपर्दा हुएतो पहचान न पाए तुमको
जोभी देखाहै वो देखा है हिजाबों में
तुम गएतो खराबातेइश्क उजड़ गया
नशा अब कहाँ बाकी रहा शराबों में
राज़ नवाद्वी जी बहुत लाजबाब ग़ज़ल है सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं ओ बी ओ पर आपकी एंट्री सुखद है आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा
पढ़ कर सुकून मिला राज़ साहेब !
शुक्रिया !
शुक्रिया जनाब अलबेला जी, आपने पढ़ने की ज़हमत उठाई!
gazal mubaraq ho janab raaz navadavi ji..........
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