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सूद पहले फिर असल दो

इक मुहब्बत की ग़ज़ल दो

जो परिन्दे छत पे आयें

उनको दाने और जल दो

शक्ल वैसी ही रहेगी

आईना चाहे बदल दो

धर्मशाला है ये दुनिया

रात काटो और चल दो

ये बदन कल तक नया था

अब पुराना है बदल दो

तुम सवेरे-शाम आओ

मेरे जीवन में खलल दो

......दीपक कुमार

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Comment

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Comment by दीपक कुमार on January 24, 2012 at 7:13pm

Raj Lally Sharma ji bahut bahut shukriya !!

Comment by राज लाली बटाला on January 23, 2012 at 10:01pm

Bahut khoob !! Chhoti behar ka kamal !! 

Comment by दीपक कुमार on January 22, 2012 at 10:19am

aadarniya  Shri Saurabh Pandey ji.. aabhaar..!!

Comment by दीपक कुमार on January 22, 2012 at 10:17am

deepak kumar ji ko deepak kumar ka.. aadaab !! kubool karein.

Comment by दीपक कुमार on January 22, 2012 at 10:13am

...aur jab ho jata hai... to teen dinon tak uski khumari nahin jati. shukriya वीनस केशरी bhai..!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2012 at 11:51pm

बहुत खूब .. बधाई इस बेहतर कोशिश पर. 

Comment by Deepak Kumar on January 17, 2012 at 5:05pm

 Deepak G. Aap ki Gazal dil ko chhu gayi hai.  Bahut khub

Comment by वीनस केसरी on January 15, 2012 at 8:46pm

धर्मशाला है ये दुनिया

रात काटो और चल दो

ऐसा शेर बार बार नहीं होता, और होता है तो बस हो जाता है ...
उम्दा शेर कहा है दीपक जी
हार्दिक बधाई

Comment by दीपक कुमार on January 13, 2012 at 8:18pm

नीरज भाई, शशिप्रकाश सैनी जी और आदरणीय योगराज प्रभाकर जी, आप सबों को मेरी ग़ज़ल पसंद आई, जानकार बहुत ख़ुशी हुई, बहुत सुकून भी मिला. इतनी सुन्दर टिप्पणियों के लिए आप सबों का आभारी हूँ. आप सबों को बहुत बहुत धन्यवाद !!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 13, 2012 at 11:39am

वाह वाह वाह - छोटी बहर में बहुत बुलंद पाये की ग़ज़ल कही है दीपक जी, हार्दिक बधाई.  

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