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Mukulkumar Limbad
  • Male
  • Danta Banaskantha Gujarat
  • India
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Mukulkumar Limbad's Page

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Mukulkumar Limbad replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-113 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभा पान्डे जी, प्रोत्साहित और सुझाव  देने के लिए हृदय से धन्यवाद"
Sep 20
Mukulkumar Limbad replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-113 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अजय गुप्ताजी,रचना की प्रशंसा के लिए हृदय से धन्यवाद आभार आपका।"
Sep 20
Mukulkumar Limbad replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-113 in the group चित्र से काव्य तक
"हरिगीतिका मैं बैठ कर घर में थकी भाभी चलो खेले नया, कुछ काम तो बाकी नहीं बैठी रही हो क्यूँ जया, है तो नहीं कोई कहाँ छोडो फिकर आओ यहाँ, मौसी चलो भाभी चलो कोई नहीं बाकी रहा|| वो खेलते हैं खेल कैसे ये नहीं मैं जानती, ये आदमी का खेल है मैं तो नहीं यह…"
Sep 20
Dimple Sharma commented on Mukulkumar Limbad's blog post मृग-बादल (तोटक छंद)
"आदरणीय मुकुल कुमार जी नमस्ते, खुबसूरत रचना पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।"
Sep 2
Dimple Sharma commented on Mukulkumar Limbad's blog post चलो सहियर
"आदरणीय मुकुल कुमार जी नमस्ते छंद की जानकारी तो नहीं परन्तु आपकी रचना पढ़कर बहुत आनन्द आया , बधाई स्वीकार करें।"
Sep 2
Mukulkumar Limbad commented on Mukulkumar Limbad's blog post चलो सहियर
"आदरणीय समर कबीरजी, सादर प्रणाम| छंद रचना को सराहने के लिए, नवोदित को होंसला देने के लिए आपका बहुत बहुत आभारी हूँ|"
Aug 29
Samar kabeer commented on Mukulkumar Limbad's blog post चलो सहियर
"जनाब मुकुल कुमार जी आदाब, अच्छी छंद रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 28
Mukulkumar Limbad posted a blog post

चलो सहियर

छंद - मंदाक्रान्ता (मातारा भानस नसल ताराज ताराज गागा = 17 वर्ण)यति =4,10,17मेेले में ओ सहियर चलो आज जाए गुमेंगे, आया है ये दिन लहरका मोज मस्ती करेंगे, मेले की है रमझट बड़ी आ टहेले वहाँ पे, खोजे मेरा प्रियतम मुझे ओ सखीरी चलो रे|भागी भागी गुपचुप सखी मैं, बात कोई न जाने, पानी का लें घट झपट से, लौटना जल्द माने, मैंने लाई यह तुज लिए हा नयी ओढनी रे, देखो कैसी तुम पर झझती ओढ ले ओढनी रे|देखें मेला सहियर चलो ना रहे पाउ यहाँ पे, लज्जा आये सहियर मुझे संग आना तु वहाँ पे, दे दीया था वचन मिलने आज आना…See More
Aug 27
Mukulkumar Limbad posted a blog post

मृग-बादल (तोटक छंद)

छंद - तोटक (सलगा सलगा सलगा सलगा = 12 वर्ण)नभ बादल बादल आज यहाँ, चमकार करे सुन वीज यहाँ, नभ काजल काजल मेश हुआ, दिलका दव ठार तु यही दुआ|मृग-बादल आज महेर दया, दिलसे बरसो अब छोड़ हया, गजराज जरा गरजे नभमें, वनराज फिरे फिरसे वनमें|टपके जलबुंद हजार कहीं, झमकार सुनो जलधार यही, जल-चुंबन अंबर से बरसे, पल ये पल को धरती तरसे|मधु सोडम जो प्रसरी भुवने, तन वो मन हाश भरे सुखमें, सुन पायल की झमकार जरा, वन मोहक शीतल घोर हरा|झरना बहता नग से झरता, किलशोर युही मृग जो सुनता, मृग-बादल आज महेर दया, दिल से बरसो…See More
Aug 26
Mukulkumar Limbad commented on Mukulkumar Limbad's blog post मृग-बादल (तोटक छंद)
"आदरणीय आशीष यादवजी, सादर प्रणाम आपकी बात सही है| चोथी पंक्ति में कमी है| जिसमे मैं सुधार करना चाहुँगा| घन्यवाद "दिलका दव ठार तु यही दुआ""
Aug 25
आशीष यादव commented on Mukulkumar Limbad's blog post मृग-बादल (तोटक छंद)
"बहुत बढ़िया छंद की रचना हुई है। बधाई स्वीकार कीजिए। शायद चौथी पंक्ति में कुछ कमी है।"
Aug 25
Mukulkumar Limbad commented on Mukulkumar Limbad's blog post मृग-बादल (तोटक छंद)
"आदरणीय समर कबीरजी सादर प्रणाम, प्रस्तुत छंद रचना प्रयास को सराहने के लिए आपका हृदय से आभार.सादर "
Aug 25
Samar kabeer commented on Mukulkumar Limbad's blog post मृग-बादल (तोटक छंद)
"जनाब मुकुल कुमार जी आदाब, अच्छी छंद रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 25
Mukulkumar Limbad posted a blog post

मृग-बादल (तोटक छंद)

छंद - तोटक (सलगा सलगा सलगा सलगा = 12 वर्ण)नभ बादल बादल आज यहाँ, चमकार करे सुन वीज यहाँ, नभ काजल काजल मेश हुआ, दिलका दव ठार तु यही दुआ|मृग-बादल आज महेर दया, दिलसे बरसो अब छोड़ हया, गजराज जरा गरजे नभमें, वनराज फिरे फिरसे वनमें|टपके जलबुंद हजार कहीं, झमकार सुनो जलधार यही, जल-चुंबन अंबर से बरसे, पल ये पल को धरती तरसे|मधु सोडम जो प्रसरी भुवने, तन वो मन हाश भरे सुखमें, सुन पायल की झमकार जरा, वन मोहक शीतल घोर हरा|झरना बहता नग से झरता, किलशोर युही मृग जो सुनता, मृग-बादल आज महेर दया, दिल से बरसो…See More
Aug 25
Mukulkumar Limbad added a discussion to the group English Literature
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An Unknown Doggy

As I'm going to the office on my way, Walking with my friend who says - An unknown doggy follows us, may be, I am not sure, I don't care! who cares?After about ten seconds, I pay attention, Follower follows us without any tension, Follower is of course not  familiar to me, & my friend. What happens then let's see,Have to find out the reason of following, It may be amazing as well as interesting, Looking at the doggy,  ignoring us firstly, As do not aware of the thing completely.By making…See More
Aug 24
Mukulkumar Limbad replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-112 in the group चित्र से काव्य तक
"आपका बहुत धन्यवाद अजय गुप्ता जी,   रचना में सुधार करने के लिए कृपया मार्गदर्शन प्रदान करेंगे तो आपका आभारी रहुँगा."
Aug 23

Profile Information

Gender
Male
City State
Gujarat
Native Place
Khedasan
Profession
Executive Magistrate & Dy. Tahsildar

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At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ यहाँ पोस्ट (क्लिक करें) कर सकते है.

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ओबीओ पर प्रतिमाह आयोजित होने वाले लाइव महोत्सवछंदोत्सवतरही मुशायरा व  लघुकथा गोष्ठी में आप सहभागिता निभाएंगे तो हमें ख़ुशी होगी. इस सन्देश को पढने के लिए आपका धन्यवाद.

Mukulkumar Limbad's Blog

चलो सहियर

छंद - मंदाक्रान्ता

(मातारा भानस नसल ताराज ताराज गागा = 17 वर्ण)यति =4,10,17

मेेले में ओ सहियर चलो आज जाए गुमेंगे,

आया है ये दिन लहरका मोज मस्ती करेंगे,

मेले की है रमझट बड़ी आ टहेले वहाँ पे,

खोजे मेरा प्रियतम मुझे ओ सखीरी चलो रे|

भागी भागी गुपचुप सखी मैं, बात कोई न जाने,

पानी का लें घट झपट से, लौटना जल्द माने,

मैंने लाई यह तुज लिए हा नयी ओढनी रे,

देखो कैसी तुम पर झझती ओढ ले ओढनी रे|

देखें मेला सहियर चलो ना रहे…

Continue

Posted on August 27, 2020 at 8:30pm — 3 Comments

मृग-बादल (तोटक छंद)

छंद - तोटक

(सलगा सलगा सलगा सलगा = 12 वर्ण)

नभ बादल बादल आज यहाँ,

चमकार करे सुन वीज यहाँ,

नभ काजल काजल मेश हुआ,

दिलका दव ठार तु यही दुआ|

मृग-बादल आज महेर दया,

दिलसे बरसो अब छोड़ हया,

गजराज जरा गरजे नभमें,

वनराज फिरे फिरसे वनमें|

टपके जलबुंद हजार कहीं,

झमकार सुनो जलधार यही,

जल-चुंबन अंबर से बरसे,

पल ये पल को धरती तरसे|

मधु सोडम जो प्रसरी भुवने,

तन वो मन हाश भरे सुखमें,…

Continue

Posted on August 24, 2020 at 11:30pm — 5 Comments

 
 
 

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