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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
.
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
प्रस्तुत है.....
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131
विषय : विषय मुक्त
अवधि : 27-02-2026 से 28-02-2026
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, 10-15 शब्द की टिप्पणी को 3-4 पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पाए इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ-साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
.    
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.
.
मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)

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स्वागतम

पत्थर पर उगती दूब
============
ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में आये ही थे कि नौकर रामू ने कहा, ’मेमसाहब का फोन आया था.."
ब्रह्मदत्तजी ने रामू की ओर देखे बिना ही अस्फुट स्वर में पूछा, "क्या कहा उन्होंने ?"
"कुछ नहीं,. आपको पूछ रही थीं"
"तुमने क्या बताया ?’
"यही कि आप पूजा कर रहे हैं"
ब्रह्मदत्तजी के चेहरे का भाव निर्विकार रहा, ".. उनसे पूछा नहीं ?" रामू सकपका गया।
"ठीक है, जाओ,,"

 

तभी निकिता कमरे में आयी, "पापा, मम्मी का फोन आया था ?"
"तुम कहाँ थी?"
"ऊपर वाशरुम में.." 
ब्रह्मदत्तजी की पुत्री निकिता एक वर्ष से अपनी पीएचडी के क्रम में साथ ही रह रही है। वह अपने पापा और मम्मी के बीच असहज रहे, और अब तो क्लिष्ट हो चुके, सम्बन्ध के बीच ही बड़ी हुई है। अपने उच्च अधिकारी पिता के सहज जीवन के प्रति वह श्रद्धा के भाव रखती है। लेकिन अपनी एडावोकेट मम्मी के कई प्रश्नों और तर्कों को वह नकार भी नहीं पाती। उनके वैवाहिक जीवन के आरम्भिक कुछ वर्षों को छोड़ दें तो ब्रह्मदत्तजी और उज्ज्वला एक साथ सहमिल जीवन गुजार ही नहीं सके हैं। अब तो अलग रहते हुए भी सात वर्षों से अधिक का समय हो चुका है। 

 

उज्ज्वला का लैंडलाइन-कॉल उनके पास आज महीनों-महीनों बाद आया था। वैसे भी उज्ज्वला उन्हें मोबाइल पर कॉल नहीं करतीं। निकिता के मन में मम्मी के कॉल को लेकर सवाल तो थे ही, ब्रह्मदत्तजी के मन में भी भारी उथल-पुथल मची थी।

 

"पापा, लेकिन आप अपनी ओर से कोई पहल भी तो नहीं करते.. सही कहूँ, तो मम्मी कई बार हमें सही भी लगी हैं... "
"कई जगह नहीं बेटा, वे हर जगह सही हैं.. अपने हिसाब से.. अपने हिसाब से वह सही ही हैं.. "
ब्रह्मदत्तजी से ऐसे उत्तर की अपेक्षा न थी, "..हाँ बेटा, एक चीफ-सेक्रेटरी की इकलौती बेटी हैं.... तिस पर उनकी मम्मी, उनके पापा.. फिर तुम बस... स्वयं में मग्न, स्वयं में तुष्ट... " कहते-कहते ब्रह्मदत्तजी रुक गये। 

 

निकिता को अपने गाँव का खपरैल घर, दोनों चाचा, दोनों बुआओं के साथ दादीजी का स्मरण हो आया। दादाजी के जल्दी गुजर जाने के बाद पापा ही तो अपने भाई-बहनों के पिता हो गये थे। अपनी पढ़ाई पूरी करता हुआ युवा पिता ! 

कि, कुर्सी पर एक तरह से निढाल होते हुए ब्रह्मदत्तजी ने कहा, "... मगर मैं एकनिष्ठ हूँ बेटा,  व्यक्तिवाची नहीं.."
****
मौलिक और अप्रकाशित 

 

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।

एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह गयी हैं। देखिएगा। सादर..

उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी। 

आप उन शब्दों या पंक्तियों को इंगित करें जहाँ आपको टंकण त्रुटियों में सुधार किये जाने की आवश्यकता है। 

बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं

जय-जय

सादर

आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई स्पष्ट संदेश नजर नहीं आया। एकनिष्ट जीवन जीने का संदेश कोई संदेश नहीं माना जा सकता।

 

आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है।

पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी जानकारी और अनुभव से उनमें मत-मंतव्य देखते हैं, ढूँढते हैं। रचनाएँ बहुधा अभिधात्मक नहीं होतीं। वे या तो व्यंजनामूलक होती हैं या कई बार लाक्षणिकता के अंतर्गत उदाहरणों के माध्यम से भी तथ्य कहे जाते हैं। यह तो हुई रचना-प्रक्रिया की बात। 

 

आपने कहा कि आप इस रचना से कोई संदेश निस्सृत होता नहीं पाते। जबकि प्रस्तुत रचना के इंगित स्पष्ट हैं। दो पृष्ठभूमियों के जन अपनी-अपनी पृष्ठभूमियों तथा कुटुम्बों के साथ जब वैवाहिक रूप से जुड़ते हैं तो विचारों का टकराव होता तो है, लेकिन एकांगी नहीं रहता। 

एकनिष्ठ और व्यक्तिवाची प्रकृति का भाव मात्र कहे गये शब्दों के परिप्रेक्ष्य में न देखें, बल्कि अनुरोध है, पात्रों के जीवन की दशाओं के परिप्रेक्ष्य में देखें। कहन स्पष्ट हो सके। खैर..

आफ़्दरणीय, मूलतः मैं लघुकथाकार महीं हूँ। यह अवश्य संभव है, मेरे कहे में अनगढ़पन हो। कथ्य प्रस्तुतीकरण में अभ्यासगत बारीकी न हो। इसे मैं स्वीकार करता हूँ। 
 
अपनी रचना के साथ इस आयोजन में मेरी उपस्थिति एक विशेष कारण से हुई है। यह आयोजन आज ही रात्रि बारह बजे समाप्त हो जाएगा। लेकिन मेरे पोस्ट के समय लगभग बारह घण्टों के बाद भी कोई रचना प्रस्तुत नहीं हुई थी। अतः मेरी मूल विधा न होते हुए भी मैं ने एक लघुकथा आनन=फानन में पोस्ट की है। लघुकथा विधा के विद्वान होते तो मेरा और भी मार्गदर्शन होता। 

सादर

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