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अजेय
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  • Karnal
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अजेय's Discussions

कैलेंडर

नौ तारीख तक कैलेंडर न आने से असुविधा होती है। यदि पहले से निर्धारित हो और 1-2 तारीख तक कैलेंडर आ जाए तो आसानी हो जाये।उम्मीद है आयोजक इस और ध्यान देंगेContinue

Started Apr 9, 2018

 

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अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"बहुत धन्यवाद विनय जी "
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"जी आपका संशय उचित है। रचना पर उपस्थिति के लिए बहुत आभार "
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"रचना पर टिप्पणी के प्रति बहुत बहुत आभार प्रतिभा जी "
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय तेजवीर जी "
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"आभार मोहन जी "
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"लौटता दौर------------ ''मम्मी, आप से एक बात करनी थी।""हाँ बोल ना!""मम्मी मैं और शकुन शादी करने की सोच रहे हैं।""अच्छी बात है। और ख़ुशी की भी। क्या क्या सोचा है तुम लोगों ने?""हम कोर्ट मैरिज करेंगें।…"
Aug 31
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"बहुत बहुत शुक्रिया माननीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी"
Aug 28
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"जी"
Aug 28
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है ऋचा जी। अनोखे अशआर।"
Aug 28
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"शुक्रिया ऋचा जी "
Aug 28
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"जी कल आपको कॉल करूँगा। बहुत आभार"
Aug 27
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"बहुत बहुत शुक्रिया माननीय।"
Aug 27
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आभार संजय जी "
Aug 27
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आदरणीय समर साहब, आपकी प्रतिक्रिया सदा की भाँति बहुत सारगर्भित और ज्ञानवर्धक हैं। तहे-दिल से आभार। आपसे एक विषय पर शंका निवारण चाहूँगा। रक्स-ए-महताब और इसी प्रकार के अन्य प्रयोग के बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि इन्हें रक्से-महताब: २२-२२१ (अलिफ वस्ल)…"
Aug 27
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"कृपया आठवां शेर ऐसे पढ़ा जाए ---- निगाहें जिसकी हिफ़ाज़त में खोईं, एक नज़रदिला दो बाग़ वो शादाब देखने के लिए"
Aug 27
अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"आह और वाह. तस्दीक़ जी एक से बढ़कर एक शेर.आनंद आ गया पढ़कर. उडा दी नींद ही जिसने हमारी आंखों कीवह कह रहा है हमें ख्वाब देखने के लिए ////वाह"
Aug 27

Profile Information

Gender
Male
City State
Karnal (Haryana)
Native Place
Karnal
Profession
Business
About me
ग़ज़ल, कविता, लघुकथा लेखन में रूचि, तीन स्वतंत्र काव्य संग्रह प्रकाशित, 3 ऑनलाइन पुस्तकें प्रकाशित. एक काव्य संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित. parivartaaajkal.com पर 'अजय की कलम' के शीर्षक से नियमित कॉलम

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अजेय's Blog

ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)

कौशिशें इतनी सी हैं बस शायरी की 

आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की

हद जुनूँ की तोड़ कर की है इबादत

ख़ूँँ जलाकर अपना तेरी आरती की

गोलियों की ही धमक है हर दिशा में

और तू कहता है ग़ज़लें आशिक़ी की!

भूले-बिसरे लफ़्ज़ कुछ आये हवा में

कोई बातें कर रहा है सादगी की

इतनी लंबी हो गयी है ये अमावस

चाँद भी अब शक्ल भूला चांदनी की

बूँद मय की तुम पिलाओ वक़्ते-रुखसत

आखि़री ख्वा़हिश यही है ज़िन्दगी…

Continue

Posted on October 7, 2020 at 5:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (और कितनी देर तक सोयेंगें हम)

पल सुनहरी सुबह के खोयेंगें हम

और कितनी देर तक सोयेंगें हम।

रात काली तो कभी की जा चुकी

अब अँधेरा कब तलक ढोयेंगे हम।

जुगनुओं जैसा चमकना सीख लें 

रोशनी के बीज फिर बोयेंगे…

Continue

Posted on September 19, 2020 at 11:20pm — 16 Comments

एक ग़ज़ल (वैलेंटाइन डे स्पेशल)

एक ग़ज़ल।

**********

बँध गई हैं एक दिन से प्रेम की अनुभूतियाँ

बिक रही रैपर लपेटे प्रेम की अनुभूतियाँ

शाश्वत से हो गई नश्वर विदेशी चाल में

भूल बैठी स्वयं को ऐसे प्रेम की अनुभूतियाँ

प्रेम पथ पर अब विकल्पों के बिना जीवन नहीं

आज मुझ से, कल किसी से, प्रेम की अनुभूतियाँ

पाप से और पुण्य से हो कर पृथक ये सोचिए

लज्जा में लिपटी हैं क्यों ये प्रेम की अनुभूतियाँ

परवरिश बंधन में हो तो दोष किसको दीजिये

कैसे पहचानेंगे…

Continue

Posted on February 14, 2019 at 1:54pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल (हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया)

हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया

लेकिन चुप है, शायद गूँगा है साया

कहने में तो है अच्छा हमराही पर

सिर्फ़ उजालों में सँग होता है साया

सूरज सर पर हो तो बिछता पाँवों में

आड़ में मेरी धूप से बचता है साया

असमंजस में हूँ मैं तुमसे ये सुनकर

अँधियारे में तुमने देखा…

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Posted on February 7, 2019 at 12:38pm — 3 Comments

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At 7:49pm on September 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ाने का ग़ज़ल पसंद आयी तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपका
At 7:46pm on August 31, 2019, dandpani nahak said…
बहुत बहुत धन्यवाद् भाई साहब अजय गुप्ता जी समय निकाल कर आपने जो मेरा हौसला बढ़ाया है बहुत शुक्रगुज़ार हूँ
At 12:56pm on May 26, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी उसे सराहा उसके लिए बहुत शुक्रिया
At 12:18pm on November 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति छंद की तुष्टि के साथ प्रदत्त चित्र के गहन भावों को भी पकड़…"
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"वाह.. वाह !  आदरणीय समर साहब, आपकी प्रस्तुति सतत अभ्यास का सुंदर उदाहरण है. जैसा कि अगाह किया…"
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