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कैसे कैसे बिकता है आदमी -- डॉo विजय शंकर

आदमी की कीमत समझता है आदमी
किस किस भाव देखिये बिकता है आदमी ॥

जमीर कीमती है जानता है आदमी
तभी उसका बड़ा खरीदार है आदमी ॥

जब चाहे जहां चाहे खरीद ले कोई
हर जगह हर वक़्त खूब बिकता है आदमी ॥

रिश्ते - दोस्ती में सब देखता है आदमी
बिकते समय कुछ नहीं देखता है आदमी ॥

खरीदार होना चाहिए देशी हो विदेशी
जानवर से भी सस्ते में बिकता है आदमी ॥

गुलामी कुप्रथा थी इक जो खत्म हो गयी
अब तो खुद बिकने को आज़ाद है आदमी ॥

नेता, अफसर-बाबू , चपरासी सब बिकते हैं
बराबर होते हैं सब, जब बिकता है आदमी ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 7, 2015 at 6:28pm
आदरणीय डॉO आशुतोष मिश्रा जी , लघु - कथा की स्वीकृति हेतु आपका आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 7, 2015 at 12:59pm

आदरणीय विजय सर इस सुंदर रचना हेतु तहे दिल बधाई स्वीकार करें ..बिलकुल सच कहा है आपने हर बस्तु की तरह आदमी भी बिकने लगा है /

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 6, 2015 at 11:06am
आदरणीय हर्ष महाजन जी, आपकी स्वीकृति एवं मूल्यांकन के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 6, 2015 at 11:04am
प्रिय मिथिलेश वामनकर जी, आपकी स्वीकृति पूर्ण विवेचना के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Harash Mahajan on August 5, 2015 at 10:27pm

आदरणीय विजय शंकर जी अति सुंदर भावपूर्ण पेशकश !! दाद !!! साभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 9:31pm

आदरणीय विजय शंकर सर, इस सुन्दर भावाभियक्ति हेतु हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2015 at 9:15pm
आदरणीय सुश्री प्रतिभा पाण्डे जी , आपका बहुत बहुत आभार एवं विशद विवेचना लिए धन्यवाद , सादर .
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2015 at 9:10pm
आदरणीय सुशील सरना जी , आपकी विस्तृत विवेचना एवं रचना को मान देने के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2015 at 9:06pm
प्रिय कृष्ण मिश्रा " जान " गोरखपुरी जी , आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2015 at 9:03pm
आदरणीय मोहन सेठी " इंतज़ार " जी , आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।

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