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अपने धंधे , अपने तरीके हैं --- डॉo विजय शंकर

धंधे को मान देना ,
धंधे की बात है ।
पेशेवर खिलाड़ियों को मान-ईनाम ,
खुद एक पेशे की बात है ।
सैनिक के शहीद होने को
पेशे से जोड़ना दुःख की बात है ।

लोगों को हिफाजत दे नहीं पाते ,
वो हादसे के शिकार हो जाएँ
तो बड़ी बड़ी शोक सभाएं ,
कैंडल-मार्च निकलवाते हैं ,
और किया तो कोई गली
सड़क उसके नाम करवाते हैं।

प्रतिभा को हम तभी जानते हैं
जब दूसरे कोई विदेशी
पहले उसे पहचानते हैं ,
तब बड़े जोश खरोश से हम
उसे अपना अपना चिल्लाते हैं.

पुरोधाओं को सम्मान देने के
हमारे अपने ख़ास तरीके हैं ,
नेत्र-हीन भिखारी को भीख
नहीं देना होता है तो
सूरदास आगे बढ़ो ,कह कर
हम पुरोधा कवि को सम्मान देते हैं ,
उनके प्रति श्रद्धा-सुमन-समर्पण को
हम यूँ प्रदर्शित करते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Views: 682

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Comment by Dr. Vijai Shanker on March 4, 2015 at 7:04pm
आदरणीय परी एम श्लोक जी, रचना को स्वीकार करने के लिए आपका आभार , आपकी सद्भावनों के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 4, 2015 at 7:03pm
प्रिय जीतेन्द्र जी, रचना को इतनी गम्भीरता से स्वीकार करने के लिए आपका आभार , आपकी सद्भावनों के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।
Comment by Pari M Shlok on March 4, 2015 at 1:48pm
सटीक एवं सार्थक प्रस्तुति बधाई आपको
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 4, 2015 at 11:01am

सादर नमन, सर. आपकी कविता पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि किसी की राहों की रुकावटों को कोई नहीं समझता. हाँ! उसकी ऊँची मंजिलों को दुसरे की नजर से ही पहचान पाते है.आपकी कविता एक बहुत बड़ा कटु सत्य है जिसे स्वीकारना ही पड़ता है. इन कमाल की पंक्तियों पर आपको बहुत-बहुत बधाई ,आदरणीय डा.विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 4, 2015 at 10:37am
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, आपको रचना का विषय, रचना का सत्य , सब पसंद आया , बहुत बहुत आभार आपका, आपकी समस्त सद्भावनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 4, 2015 at 10:12am

आदरणीय विजय भाई , होता तो सच में यही सब है , कटु है पर सत्य है आपकी बात ॥ बहुत अच्छा विषय लिया है आपने रचना के लिये ! आपको हार्दिक बधाई रचना के लिये ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 4, 2015 at 4:01am
प्रशस्ति पूर्ण आपकी आख्या बहुत ही उत्साहवर्धक है , प्रिय मिथिलेश जी , वैसे लिखा तो वही है जो रोज देखते हैं , और वह न जाने कितने समय से ऐसा ही हैं। आपकी समस्त सदभावनाओं के लिए ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 3, 2015 at 8:40pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, सोचने पर मजबूर करती भावपूर्ण सुन्दर कविता हुई है,  विशेष रूप से-- प्रतिभा को हम तभी जानते हैं\
जब दूसरे कोई विदेशी\पहले उसे पहचानते हैं ,\तब बड़े जोश खरोश से हम\उसे अपना अपना चिल्लाते हैं.\---\पुरोधाओं को सम्मान देने के
/हमारे अपने ख़ास तरीके हैं ,\नेत्र-हीन भिखारी को भीख\नहीं देना होता है तो\सूरदास आगे बढ़ो ,कह कर\हम पुरोधा कवि को सम्मान देते हैं ,\ ----ये कमाल की पंक्तिया है. इस सुन्दर और प्रभावित करती कविता पर हार्दिक बधाई निवेदित है.

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 8:36pm
आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी, आपकी परख को नमन , आपका आभार, आपकी सद्भावनाओं और प्रशस्ति हेतु धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 8:33pm
आदरणीय सोमेश कुमार जी, आपकी दृष्टि को नमन, रचना को आपने पारखा, आभार, आपकी सद्भावनाओं और प्रशस्ति हेतु धन्यवाद, सादर।

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