For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं,

अक्सर यूँ होता है जब भी,
बात से बात उलझती है,
सोची हुई कहते हैं कुछ,
और कुछ तो यूँ ही फिसलती है
वो अन-सोची बातें ही दिल में,
रह जाती हैं क्या कहिये,
सोच-सोच कर जो भी कहा था
नापा-तौला याद नहीं,

जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इनती बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,
राहें वापस जाने की कभी,
हमने ढूंढी बोलो तो ?
मंजिल की धुन में तुम जैसे ही,
कोई मोड़-दोराहा याद नहीं,

एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ, एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं |

Views: 541

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Raj Tomar on July 21, 2012 at 5:30pm

"जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इनती बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,"

वाह ..बहुत खूब ..एक अच्छी कविता के लिए बधाई . :)

Comment by Aradhana on September 13, 2011 at 1:24pm

आदरणीय अंबरीश जी, एक एक कविता जब अपने से अलग करते हैं लगता है एक और भाव से अपने को एक साथ जोड़ लिया और दूर भी कर लिया. और उस पर आपलोगों का उसे पसंद करना अपने पर विश्वास बढ़ा देता है..एक बार फिर शब्द ढूँढने निकल पड़ते हैं...बहुत शुक्रिया,सादर,आराधना

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2011 at 9:25pm

//अक्सर यूँ होता है जब भी,
बात से बात उलझती है,
सोची हुई कहते हैं कुछ,
और कुछ तो यूँ ही फिसलती है
वो अन-सोची बातें ही दिल में,
रह जाती हैं क्या कहिये,
सोच-सोच कर जो भी कहा था
नापा-तौला याद नहीं,//

आदरणीया आराधना जी !  काफी देर तक इसे को गुनगुनाते रहे हम .........इस सशक्त व प्रवाहयुक्त गीत के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें .........:-)

Comment by fauzan on September 10, 2011 at 10:48pm

एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ, एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं .........waaaaaaaaaaaaaaaaaah.........bahut khoob....

Comment by Er. Pawan Kumar Shukla on September 10, 2011 at 12:20pm

very nice

Comment by Aradhana on July 25, 2011 at 6:46pm

aapka hardik dhanyavad, aapki sarahna humein protsahit karti hai ke hum prayatnsheel rahein.

 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 25, 2011 at 3:34pm

प्रस्तुत कविता अपनी ही रौ में बहे जाती है. मानों एक अनमनायी-सी धारा अपनी राह ढूँढती, बनाती धीरे-धीरे सरसती जा रही हो..अलसायी-सी. ’कुछ वही-वही, कुछ नया अभी’ के भावों में स्वयं चकित होती हुई-सी.   या, ’जो बीत गया, क्यों बीत गया’ के अनुत्तरित सवालों की गहन लोच में उजबुजायी हुई-सी.  और, पढ़नेवाला इसकी बेलौस रवानी में संग-संग अनायास बहता जाता है.

इसकी दुर्निवारता का अनुगामी स्वर अप्रस्फुटित कैसे रहे -

कुछ सिले .. कई बार मिले

क्यों फिसल गये.. कुछ याद नहीं... 

 

संवेदना और संभावनाओं के प्रति हार्दिक शुभकामनाएँ. .

Comment by Aradhana on July 25, 2011 at 11:03am

Ved Ji and Ganesh jee, thanks for your words of appreciation. 

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 24, 2011 at 7:28pm

जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इतनी बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,
राहें वापस जाने की कभी,

हमने ढूंढी बोलो तो ?
मंजिल की धुन में तुम जैसे ही,
कोई मोड़-दोराहा याद नहीं,

 

बहुत ही खुबसूरत कविता, लेखिका ने भावनाओं को बहुत ही सलीके से प्रेषित किया है | बधाई स्वीकार करें इस शानदार अभिव्यक्ति पर |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
Monday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
Sunday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
May 30

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service