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एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं,

अक्सर यूँ होता है जब भी,
बात से बात उलझती है,
सोची हुई कहते हैं कुछ,
और कुछ तो यूँ ही फिसलती है
वो अन-सोची बातें ही दिल में,
रह जाती हैं क्या कहिये,
सोच-सोच कर जो भी कहा था
नापा-तौला याद नहीं,

जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इनती बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,
राहें वापस जाने की कभी,
हमने ढूंढी बोलो तो ?
मंजिल की धुन में तुम जैसे ही,
कोई मोड़-दोराहा याद नहीं,

एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ, एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं |

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Comment

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Comment by Raj Tomar on July 21, 2012 at 5:30pm

"जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इनती बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,"

वाह ..बहुत खूब ..एक अच्छी कविता के लिए बधाई . :)

Comment by Aradhana on September 13, 2011 at 1:24pm

आदरणीय अंबरीश जी, एक एक कविता जब अपने से अलग करते हैं लगता है एक और भाव से अपने को एक साथ जोड़ लिया और दूर भी कर लिया. और उस पर आपलोगों का उसे पसंद करना अपने पर विश्वास बढ़ा देता है..एक बार फिर शब्द ढूँढने निकल पड़ते हैं...बहुत शुक्रिया,सादर,आराधना

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2011 at 9:25pm

//अक्सर यूँ होता है जब भी,
बात से बात उलझती है,
सोची हुई कहते हैं कुछ,
और कुछ तो यूँ ही फिसलती है
वो अन-सोची बातें ही दिल में,
रह जाती हैं क्या कहिये,
सोच-सोच कर जो भी कहा था
नापा-तौला याद नहीं,//

आदरणीया आराधना जी !  काफी देर तक इसे को गुनगुनाते रहे हम .........इस सशक्त व प्रवाहयुक्त गीत के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें .........:-)

Comment by fauzan on September 10, 2011 at 10:48pm

एक बात कही थी याद है अब तक
लहज़े-वह्ज़े याद नहीं
एक दर्द हुआ, एहसास है अब तक
दिल या ज़हन में याद नहीं .........waaaaaaaaaaaaaaaaaah.........bahut khoob....

Comment by Er. Pawan Kumar Shukla on September 10, 2011 at 12:20pm

very nice

Comment by Aradhana on July 25, 2011 at 6:46pm

aapka hardik dhanyavad, aapki sarahna humein protsahit karti hai ke hum prayatnsheel rahein.

 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 25, 2011 at 3:34pm

प्रस्तुत कविता अपनी ही रौ में बहे जाती है. मानों एक अनमनायी-सी धारा अपनी राह ढूँढती, बनाती धीरे-धीरे सरसती जा रही हो..अलसायी-सी. ’कुछ वही-वही, कुछ नया अभी’ के भावों में स्वयं चकित होती हुई-सी.   या, ’जो बीत गया, क्यों बीत गया’ के अनुत्तरित सवालों की गहन लोच में उजबुजायी हुई-सी.  और, पढ़नेवाला इसकी बेलौस रवानी में संग-संग अनायास बहता जाता है.

इसकी दुर्निवारता का अनुगामी स्वर अप्रस्फुटित कैसे रहे -

कुछ सिले .. कई बार मिले

क्यों फिसल गये.. कुछ याद नहीं... 

 

संवेदना और संभावनाओं के प्रति हार्दिक शुभकामनाएँ. .

Comment by Aradhana on July 25, 2011 at 11:03am

Ved Ji and Ganesh jee, thanks for your words of appreciation. 

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 24, 2011 at 7:28pm

जो साथ खड़े हो तुम मेरे,
तो इतनी बात तो सच होगी,
जिस राह से तुम चल कर आये,
हमने भी वही तो चुनी होगी,
राहें वापस जाने की कभी,

हमने ढूंढी बोलो तो ?
मंजिल की धुन में तुम जैसे ही,
कोई मोड़-दोराहा याद नहीं,

 

बहुत ही खुबसूरत कविता, लेखिका ने भावनाओं को बहुत ही सलीके से प्रेषित किया है | बधाई स्वीकार करें इस शानदार अभिव्यक्ति पर |

कृपया ध्यान दे...

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