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दर्दों गम से हर कोई बेजार है,

हादसों की हर तरफ़ दीवार है।

 

बिक रहे हैं वो भी जो अनमोल हैं,

 कैसे नादानों का ये बाज़ार हैं।

 

सब्र अब सबका चुका लगता मुझे,

हर बशर लड़ने को बस तैय्यार है।

 

पल में तोला पल में माशा मत बनो,

ये भी जीने का कोई आधार है।

 

मुफलिसी के मारे लगते हैं सभी,

फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं।

 

जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,

उनकी ही उतनी बड़ी सरकार है।

 

अब भरोसा भी करें किस पर ‘प्रदीप’

दिल है नादां और जहाँ अय्यार है।

.

-प्रदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अप्रकशित

02-07-2019

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 8, 2019 at 12:16pm

शुक्रिया समर जी, ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहिए, बंदा भी कुछ सीख जाएगा।

Comment by Samar kabeer on July 7, 2019 at 12:20pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं'

इस मिसरे में रदीफ़ बदल गई है,देखें ।

'जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,'

इस मिसरे में 'ज़्यादा' की जगह "जितनी'' शब्द उचित होगा क्योंकि सानी में 'उतनी' शब्द है ।

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