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"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग्य ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|
लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी लेकिन उनके सोच के स्तर को देखकर उसने उनसे ज्यादा बात करना लगभग छोड़ दिया था| इसी बात को लेकर कुछ महिलाओं ने उसे नीचा दिखाने का सोच लिया था और कई बार उनकी बातों का वह मुंहतोड़ जवाब दे चुकी थी और इनको नज़रअंदाज करना भी उसने सीख लिया था|
पिछले कई सालों से उसे कम से कम महीने में एक दिन बिस्तर पकड़ना ही पड़ता था| इतना भयानक दर्द होता था कि काम करना तो दूर, वह ठीक से चल फिर भी नहीं पाती थी| दवा से बस इतना होता कि आराम से लेट लेती थी लेकिन घर से निकलना तो सोच भी नहीं सकती थी| अगले दिन भी दिक्कत बहुत होती थी लेकिन किसी तरह दिन बीत जाता था| पिछले महीने ही उसने बॉस की सेक्रेटरी और साथ की महिलाओं को बता दिया था कि उस एक दिन वह किसी भी हालत में काम पर आने लायक नहीं रहती|
उसने एक बार सोचा कि बात ख़त्म की जाए और वह मुड़कर जाने को हुई| लेकिन तभी बॉस और सेक्रेटरी की हंसी ने उसके मन में आग लगा दी| पलटकर उसने बॉस की आँखों में ऑंखें डालते हुए कहा " शायद आपको इसके बारे में पता हो यही सोचकर तो मैंने आपकी सेक्रेटरी को अपने तकलीफ के बारे में बता दिया था| मैंने सोचा था कि वह आपको बता देगी और आप समझ जाएंगे| खैर आपकी पत्नी तो शायद इस दर्द के बारे में आपसे बात नहीं करती होगी लेकिन मैं अब आपको हर महीने बता दिया करुँगी और उस एक दिन नहीं आ पाऊँगी"|
वह बॉस के केबिन से बाहर निकल गयी और पीछे बंद हुए दरवाजे की आवाज पूरे ऑफिस को सुनाई पड़ रही थी|
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on September 27, 2017 at 12:27pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी।बेहतरीन लघुकथा।

Comment by Samar kabeer on September 27, 2017 at 12:19pm
जनाब विनय कुमार जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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