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बटा ग़िलाफ़ तलक माँ की उस रिजाई का (ग़ज़ल 'राज')

1212 1122 1212 22 (ग़ज़ल कतआ से शुरू है )

किसी की आँख से अश्कों की आशनाई का

किसी जुबान से लफ़्ज़ों की बेवफाई का

सुखनवरों का हुनर है जो ये समझते हैं

भला क्या रिश्ता है कागज से रोशनाई का

जमीन बिछ गई आकाश बन गया कम्बल

बटा ग़िलाफ़ तलक  माँ की उस रिजाई का

जहर भी पी गई मीरा  जुनून-ए-उल्फत में

न होश था न उसे इल्म जग हँसाई का

लगाम लग गई उसके फिजूल खर्चों पर

गया जो पैसा निकलकर निजी कमाई का

ये जानते हैं सभी बात है ये जग जाहिर

सही से होता न सम्मान घर जमाई का

दिलों में पाप छुपा हो जुबान पर शीरी

असर खुदा पे नहीं  होता उस दुहाई का

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:47pm

आद० डॉ.  आशुतोष जी,आपकी इस होस्लाफ्जाई का शुक्रिया | ये ग़ज़ल मतले से नहीं कता से शुरू हुई है जो मैं लिखना भूल गई थी अब कुछ संशोधन के साथ पुनः प्रकाशित करवा रही हूँ | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:45pm

आद० गिरिराज जी आपको ग़ज़ल अच्छी लगी आपका बहुत बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:45pm

आद० गिरिराज जी आपको ग़ज़ल अच्छी लगी आपका बहुत बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:44pm

आद० समर भाई जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपने कता बंद मतले पर ध्यान दिया आपका बहुत बहुत शुक्रिया मैं पोस्ट करते वक़्त ये लिखना भूल गई थी उस वक़्त कहीं जाने की जल्दी में थी | रेशा रेशा वाला मिसरा   भी अब दुरस्त कर दिया है इस पर आपकी पुनः राय चाहती हूँ  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:41pm

आद० सुरेन्द्र नाथ भाई जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई बहुत बहुत शुक्रिया |आपकी इस बात का जबाब मैंने नीलेश भैय्या को भी दे दिया है ग़ज़ल मतले से नहीं कता से शुरू है ये मैं लिखना भूल गई थी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:39pm

आद० गुरप्रीत जी आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया | हाँ इसमें क्या शब्द का वजन गिराया है मेरे ख्याल से तो ये सही है मैंने बहुत ग़ज़लों में एसा देखा है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2017 at 10:37pm

आद० नीलेश भैय्या ,ग़ज़ल पर बहुत दिनों बाद आना हुआ प्रवास पर थी नेट पर आना मुनासिब नहीं था अब जाकर फ्री हुई हूँ तो आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ रही हूँ| दरअसल ग़ज़ल पोस्ट करने के बाद ही मैं अपनी गलती को याद कर रही थी ये ग़ज़ल क्तआ से शुरू है जो मैं लिखना भूल गई थी इसी लिए आपको मतला अधूरा सा लगा |हाँ रेशा रेशा के विषय में आप  सही हैं मैं इसकी  जगह  ---ग़िलाफ़ तक बटा  जो माँ की उस रिजाई का   कर रही हूँ आपका बहुत बहुत आभार भैय्या 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 25, 2017 at 9:14am
आदरणीया शानदार ग़ज़ल हुयी है सुरेन्द्र भाई की बात से मैं भी सहमत हूँ मैं लिखने वाला था उन्होंने पहले ही लिख दिया था सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2017 at 7:33pm

आदरनीया राजेश जी , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें । आदरनीय समर भाई जी की बात सही है , खयाल कीजियेगा ।

Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 2:54pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,मतला और उसके बाद का शैर क़त'अ बन्द है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
शिल्प की कमज़ोरी ग़ज़ल को मुतास्सिर कर रही है,इस पर लगाम कसने की ज़रूरत है ।

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