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सभ्यता की पहचान

दिन,प्रतिदिन,
हर एक पल,
हमारी सभ्यता और संस्कृति में
निखार आ रहा है,
हम हो गए हैं,
कितने सभ्य,
कौआ यह गीत गा रहा है.
पहले बहुत पहले,
जब हम इतने सभ्य नहीं थे,
चारों तरफ थी खुशहाली,
लोगों का मिलजुलकर,
विचरण था जारी,
जितना पाते,
प्रेम से खाते,
दोस्तों पाहुनों को खिलाते,
कभी-कभी भूखे सो जाते.
आज जब हम सभ्य हो गए हैं,
देखते नहीं,
दूसरे की रोटी,
छिनकर खा रहे हैं,
और अपनों से कहते हैं,
छिन लो,दूसरों की रोटी,
न देने पर,
नोच लो बोटी-बोटी,
क्योंकि हम सभ्य हो गए हैं,
पिल्ले हो गए हैं.
बहुत पहले घर का मालिक,
सबको खिलाकर,
जो बचता रुखा-सूखा,
उसी को खाता,
भरपेत ठंडा पानी पीता,
आज जब हमारी सभ्यता,
आसमान छू रही है,
घर का क्या ?
देश का मालिक,
हींकभर खाता,
भंडार सजाता,
चैन से सोता,
बेंच देता,
देशवासियों का काटकर पेट,
क्योंकि हम सभ्य हो गए हैं.

-------प्रभाकर पाण्डेय

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 6, 2010 at 12:06am
बिल्कुल सत्य........ बदलते सामाजिक परिवेश में ...परिवार...अतिथि.....मित्र...प्रेम..... दान.......सहायता.....जैसे शब्द बेमानी नज़र आते हैं....सबको अपने स्वार्थ की साधाना जो करनी है.........एक सुन्दर कवित के माध्यम से एक बार पुनः याद दिलाने हेतु धन्यवाद..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2010 at 5:44pm
जितना पाते,
प्रेम से खाते,
दोस्तों पाहुनों को खिलाते,
कभी-कभी भूखे सो जाते.
आज जब हम सभ्य हो गए हैं,
देखते नहीं,
दूसरे की रोटी,
छिनकर खा रहे हैं,

Bahut hi sunder rachna, sawal yah uthata hai ki kyaa ham sachmuch sabhya ho gayey hai, kyaa yahi sabhyata hai, ham kaha they aur ab kaha jaa rahey hai, Prabhakar bhaiya ees vicharutejak aur sargarbhit abhivyakti hetu Badhai swikaar karey, Dhanyavad,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 2, 2010 at 4:23pm
प्रभाकर पाण्डेय भाई, बहुत ही विचारोत्तेजक कविता कही है आपने ! हरेक शब्द और हरेक पंक्ति एक कड़वा सच बोल रही है और सोचने पर मजबूर कर रही है ! मानवीय मूल्यों और संवेदनायों का जो दिन प्रतिदिन ह्रास हो रहा है उसका बहुत ही सजीव चित्रण किया है आपने ! बधाई स्वीकार कीजिये इस सारगर्भित रचना के लिए ! 2-3 जगह बर्तनी सम्बंधित त्रुटियाँ हैं, कृपया उनको ठीक कर लीजिए !
Comment by Rash Bihari Ravi on July 2, 2010 at 3:55pm
देश का मालिक,
हींकभर खाता,
भंडार सजाता,
चैन से सोता,
बेंच देता,
देशवासियों का काटकर पेट,
क्योंकि हम सभ्य हो गए हैं.
bahut badhia

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