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आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह गया (ग़ज़ल 'राज ')

2122  2122  2122  212

इक मुहब्बत का महल कब चुपके चुपके ढह गया

बिन किये आवाज सब आँखों का काजल कह गया

 

अनमनी सी वो अकेली रह गई किश्ती खड़ी

पाँव के नीचे से ही सारा समन्दर बह  गया

 

वो खुदा भी उस फ़लक से देख कर हैरान है

आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह  गया

 

ठोकरों ने ही तराशे वो पशेमाँ पंख फिर

ताकते परवाज़ से पीछे गुज़शता रह गया

 

फूल से भी जो हथेली सुर्ख  होती थीं  कभी

उस हथेली में पिघल कर आज सूरज बह गया

--------------मौलिक एवं अप्रकाशित  

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2016 at 5:27pm

आद० अर्पणा शर्मा जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका दिल से बहुत बहुत शुक्रिया | 

Comment by Arpana Sharma on October 10, 2016 at 4:20pm
एक सुंदर गज़ल। बधाई एवं सादर नमन आ.राजेश कुमारी जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2016 at 11:20am

आद० रामबली गुप्ता जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सफल हुआ आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया | 

Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:06am
वाह वाह सारे शेर सुंदर हैं आदरणीया राजेश कुमारी जी।दिल से बधाई लीजिये। 'उस फलक' के बारे में आद0 समर भाई साहब से सहमत हूँ।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 8:00pm

आद० धर्मेन्द्र सिंह जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से बहुत बहुत आभार आपका | 


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Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:59pm

आद० सुरेन्द्र नाथ सिंह जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:58pm

आद० श्याम नारायण वर्मा जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:57pm

आद० समर कबीर भाई जी, ग़ज़ल आपकी कसौटी पर खरी उतरी आपको पसंद आई दिल से आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपकी इस्स्लाह का सदैव स्वागत है आपने सही कहा  अब होना चाहिए अभी तो मूल रचना में सुधार लिया है |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:54pm

आद० सुरेश कुमार कल्याण जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:53pm

आद० सुशील सरना जी,उत्साह वर्धन करती हुई आपकी इस प्रतिक्रिया की बेहद शुक्रगुजार हूँ मेरा लिखना सार्थक हो गया दिल से बहुत बहुत आभार | 

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