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भावना के ज्वार से खुद को निकाल ले----ग़ज़ल (पंकज मिश्र)

2212 1212 2212 12
मन की फिज़ा बिगाड़ के, बरसात रोकते?
बकवास से ख़याल तो, अब मत ही पालिये

जब की सुनामी हो उठी, धड़कन के शह्र में
वाज़िब है दिल के घाट से, कुछ फासला रहे

सुनिये तो साहिबान ये, सर्कस अजीब है
सपनों में विष मिलाते हैं अपने ही काट के

मरहम लिए हक़ीम तो मिलते तमाम हैं
ये और बात उसमें नमक मिर्च डाल के

क्या रोग पाल बैठा है, पंकज इलाज़ कर
तू भावना के ज्वार से खुद को निकाल ले

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 18, 2016 at 3:55pm
आदरणीय सुरेश जी सादर आभार
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 18, 2016 at 3:53pm
सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 18, 2016 at 3:51pm
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम। इंगित दोष को दूर करने की कोशिश करता हूँ।
Comment by Samar kabeer on September 18, 2016 at 3:38pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
आख़री शैर के सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर का दोष आ गया है,'निकाल ले'इसे दूर करने की कोशिश करें ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 16, 2016 at 9:48pm
आदरणीय श्याम नारायण सर सादर आभार
Comment by Shyam Narain Verma on September 16, 2016 at 10:22am
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर

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