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बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212

दीप जलकर थक गया ऐसे समय आये तो क्या
हो गया जीवन धुंआ तब गीत यदि गाये तो क्या

चाहता था मैं तृषित उस दृष्टि का आभास हो
नेह की सूखी फसल पावस कहर ढाये तो क्या

है प्रतीक्षा में कठिन तिल-तिल सुलगना उम्र भर
स्वाति यदि निष्प्राण चातक को नहा जाए तो क्या

हो सके कब स्वयम के, परिवार के या प्यार के
गीत के या देश के हित कुछ न कर पाए तो क्या

राग की , अनुराग की रुत सर्वदा आती नही
जल चुका दावाग्नि सा तब जलद–पट छाये तो क्या

आंसुओं में थे विरह के गीत जो मेरे ढले
उम्र की काली अमावस में तुम्हे भाये तो क्या

मैं क्षितिज को पार करके आ गया हूँ इस तरफ
तुम अगर भागीरथी का श्रोत भी लाये तो क्या

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 1, 2016 at 5:41pm
श्रद्धेय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी मैं गजल के बारे में अधिक तो नहीं जानता मगर कोशिश में लगा रहता हूँ।आपकी इस गजल के प्रत्येक शेर ने दिल को छू लिया।हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on August 1, 2016 at 5:24pm
सुंदर भावों की सुंदर गजल   … हार्दिक बधाई आदरणीय .सादर
Comment by रामबली गुप्ता on August 1, 2016 at 3:15pm
वाह वाह और वाह इस ग़ज़ल को पढने के बाद बस एक शब्द-वाह। शेर दर शेर बधाई लीजिये आद0 गोपाल नारायण जी। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल हुई है। गिरिराज भाई जी के अनुसार बहर में संशोधन का अनुरोध है। पुनः बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 1, 2016 at 9:23am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , बहुत खूबसूरत गज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ कुबूल करें ।

दो श्ब्दों की मात्रिकता गलत लेने से दो मिसरे बेबह्र हो गये हैं , कृपया देख लीजियेगा --

हो सके कब/   स्वयम के, परि/ वार के या / प्यार के    ---स्वयम --12  आपने 21 मात्रा लेली है

जल चुका दा/ वाग्नि सा तब/   जलद–पट छा/ ये तो क्या   ---    जलद  - 12  सही है , आपने इसकी भी  मात्रा 21 ले ली है

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 1, 2016 at 7:02am
बहुत खूब । इस रचना के लिए बधाई आदरणीय।

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