For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल : कभी हुयी थी निसार आंखे कभी बहारे हयात आई

1212 212 122  1212 212 122

            

कभी हुयी थी निसार आंखे कभी बहारे हयात आई

नहीं दिखा फिर मुझे सवेरा सदैव हिस्से में रात आई

 

बहुत बटोरे थे स्वप्न आतुर बहुत सजाये थे ख़्वाब मैंने 

मेरी मुहब्बत मेरी जिदगी विदा हुयी तब बरात आयी

 

घना तिमिर था न रश्मि कोई न सूझ पड़ता था पंथ मुझको

बिना रुके ही मैं अग्रसर था  निदान मंजिल हठात आई  

 

मुझे स्वयं पर रहा भरोसा नहीं जुटाये अनेक साधन

मुझे बनाने मुझे सजाने  कभी-कभी कायनात आयी

 

हृदय हमारा गरीब ब्राह्मण प्रवंचना में बना सुदामा

अधीर कान्हा के आंसुओं से धुले चरण तब परात आयी

 

बखान करता हूँ कृष्ण का मैं कभी रमापति के गीत गाता

हुआ हकीकी है इश्क मुझको कहाँ मजाजी की बात आयी

 

यहाँ तुम्हारी थी गर्म चर्चा, बड़ी अजब आसमाँ की बातें,                                                         

 वहां अचानक विदा हुए तुम खबर बड़ी वाहियात आयी

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Views: 1191

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2016 at 10:12am

आआ० बाली जी , बारात  तत्सम है , बरात तद्भव  .प्रचलन में बरात शब्द अधिक्  व्यापक है  सब्दकोश में भी इसे  मान्यता मिली है

3. बरात : (page 3398)

हाथी, घोड़े, ऊँट या फुलवारी आदि भी रहती है । बरपक्ष के लोग, जो विवाह के समय वर के साथ कन्यावालों के यहाँ जाते हैं । जनेत । क्रि० प्र०—आना ।—जाना ।—निकलना ।—सजना ।—सजाना । २. कहीं एक साथ जानेवालों का बहुत

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 10:12am

आ० गोपाल भाई जी ,बह्र बताने का बहुत बहुत शुक्रिया आपके मिसरे बह्र पर सही कसे हुए हैं |

परात वाला मिसरा दुबारा पढ़ा पूर्णतः स्पष्ट हुआ जो एकदम दुरुस्त है |इस प्रस्तुति पर पुनः बधाईयाँ लीजिये |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2016 at 9:55am

आ० दीदी , बहर इस प्रकार है    

बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला

मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212 212 122

अधीर कान्हा के आंसुओं से धुले चरण तब परात आयी---   लग रहा है की चरण पहले धुल गए हैं तब परात आई है 

 -------- मेरा यही आशय है  सादर .  मार्ग दर्शन अपेक्षित.

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2016 at 9:41am

आ० अनुज , मझ जैसे नौसिखिए को आपसे प्रेरणा मिलती है . आपने बहर के रुक्न 12122    12122    12122    12122  बताये यानि कि मुफायलातुन्. मुफायलातुन  मुफायलातुन्. मुफायलातुन् किन्तु मेरी बह्र है-

बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला

मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212 212 122------------------------ मार्ग दर्शन चाहूँगा .

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 28, 2016 at 11:16pm

गोपाल जी आपको बहुत बहुत बधाइयाँ । गिरिराज जी ने  सही रुक्न लिख के तक्तीअ कर दिया है। 

ये बहुत ही मक़बूल बहर है जिस पर ये फिल्मी गाना है 

बड़ी वफा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी बेवफ़ाई ...

वैसे बारात का क़ाफ़िया यहाँ नहीं आएगा ...बारात होता है न की बरात 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 28, 2016 at 11:10am

ये कौन सी बह्र है मैं समझ नहीं पा रही हूँ --जैसे की आ० गिरिराज जी ने अरकान लिखे १२१२२  सालिम अरकान में मुसम्मिन हैं तो भी बह्र का नाम क्या है क्यूंकि ये सालिम अरकान तो अरुज शास्त्र में नहीं है या मुझे ही याद नहीं है 

आद० गोपाल भाई जी आपसे गुजारिश है आप इस बह्र का नाम भी बता दें फिर ग़ज़ल समझने में और आसान हो जायेगी 

मेरी मुहब्बत मेरी जिदगी विदा हुयी तब बरात आयी---इसकी बह्र जांच लें 

मेरी मुहब्बत ये जीस्त मेरी  विदा हुयी तब बरात आयी--ऐसे कर सकते हैं 

अधीर कान्हा के आंसुओं से धुले चरण तब परात आयी---जब  परात कर लें  वरना लग रहा है की चरण पहले धुल गए हैं तब परात आई है 

इस लम्बी बह्र  पर बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है भाई जी दिल से बहुत-बहुत बधाई| 

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 27, 2016 at 2:36pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , क्या बात है , बहुत कठिन बहर को लेकर बढिया निभाया आपने । आपको दिली मुबारक बाद आदरनीय ।

बह्र के रुक्न ऐसे होंगे  --  12122    12122    12122    12122  सुधार लीजियेगा ।

Comment by Harash Mahajan on June 27, 2016 at 2:24pm

बहुत ही बेहतरीन उम्दा ..शुरुआत ही सुंदर हुई..

"

कभी हुयी थी निसार आंखे कभी बहारे हयात आई

नहीं दिखा फिर मुझे सवेरा सदैव हिस्से में रात आई".......

शेर सभी दिल को छू गये...!! दाद सर !!


सादर !!

Comment by Shyam Narain Verma on June 27, 2016 at 11:24am
बेहद उम्दा ...बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 26, 2016 at 8:42pm
आ. डॉ. गोपाल नारायण सर तीन बह्रों का संयोजन अद्भुत है। रचना के भाव अच्छे हैं, बहर भी खूब निभाई है। पर ये प्रयोग शिल्प की दृष्टि से सही है या नहीं? ये पता नहीं।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"जय हो "
9 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"सरसी छंद +++++++++ उषा काल आरम्भ हुआ तब, अर्ध्य दिये नर नार। दूर हुआ अँधियारा रवि का, फैले तेज…"
11 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Jan 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Jan 18
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Jan 17

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service