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वो इक बार दिल में हमें दाखिला दें

बहर- 122*4

सभी आज शरमों हया हम मिटा दें
हमें है मुहब्बत उन्हे हम बता दें


सजोंये सदाचार है जो अभी तक
अनोखा मेरा गाँव तुमको दिखा दें


नज़र लग न जाये बड़ी खूबसूरत
ये तस्वीर उनकी कहीँ हम छुपा दें


न हो दुश्मनी साथ मिलकर रहे हम
कोई फूल यारो हम ऐसा खिला दें


डिग्री साथ होगी हमारी विदाई
वो इक बार दिल में हमें दाखिला दें

यही आरजू है हमारी खुदा से
हमें हर जनम में उन्ही का बना दें


गरीबों पे करके सितम क्या मिलेगा
करे हम मदद ताकि हमको दुआ दें


रखा है छिपाकर 'अतुल' ऐब सारे
चलो अब इसे होलिका में जला दें
************************


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 16, 2016 at 3:16pm

आदरणीय भाई महर्षि जी ..मुहब्बत के रंगों से रंगी सुंदर ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on June 15, 2016 at 7:25pm

आदरणीय महर्षि साहेब ...............वाह वाह 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 15, 2016 at 6:04pm

आदरणीय महर्षि भाई , बहुत अच्छी गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ।

सभी आज शरमों हया हम मिटा दें    ---  गलत कुछ भी नही है ,, फिर भी अगर सही लगे तो , सभी के स्थान मे चलो  कहा जा सकता है -

चलो आज शरमों हया हम मिटा दें  --  कोई ज़रूरी नही है ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 15, 2016 at 5:36pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.

कृपया ध्यान दे...

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