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ये गठरी!
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ये गठरी!
कब होगी हलकी,
परायों के समानार्थी,
अपनों के कर्ज से छलकी!

मूलाॅंश को पटाने की
योजना बनाई मैंने,
तत्क्षण,
अपनी अपनी व्याज दर बढ़ाई इन्होंने।
जिंदगी की रेलगाड़ी,
कभी पा न सकी पटरी!

कुछ लोग,
सुखपूर्वक जीते हैं,
कर्ज लेकर भी घी पीते हैं!
और,
चुकाने के नाम पर---
देते हैं धमकी!

सुख! क्या है?
क्या पता।
घर! क्या है?
नहीं सकता बता।
किराये की जिंदगी,
जगह जगह अटकी।

हर साॅंस !
बंधाती है यही आस,
आयेगा कोई क्षण,
जब बुझेगी प्यास....
अभी तो,
अश्रुसागर में में ही लगा डुबकी।

3 जुलाई 2006
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 513

Comment

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Comment by Dr T R Sukul on April 27, 2016 at 10:20pm

आदरणीय सुशील  सरना जी , रचना की प्रशंसा करने के लिए विनम्र आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 27, 2016 at 7:41pm

सुख! क्या है?
क्या पता।
घर! क्या है?
नहीं सकता बता।
किराये की जिंदगी,
जगह जगह अटकी।

बहुत सुंदर आदरणीय टी आर शुक्ल जी .... यथार्थ का आईना दिखाती इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई सर।

Comment by Dr T R Sukul on April 27, 2016 at 5:06pm

आदरणीय मिथिलेशजी , रचना को पसंद करने के लिए विनम्र धन्यवाद। 

Comment by Dr T R Sukul on April 27, 2016 at 5:06pm

आदरणीया रजेशकुमारी जी , रचना पर उपस्थित होकर अपनी सार गर्भित टीप से उसे सुसज्जित करने के लिए विनम्र आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 26, 2016 at 11:34pm

आदरणीय शुक्ल जी, इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 26, 2016 at 9:23pm

ये गठरी! 
कब होगी हलकी,
परायों के समानार्थी,
अपनों के कर्ज से छलकी!

मूलाॅंश को पटाने की
योजना बनाई मैंने,
तत्क्षण,
अपनी अपनी व्याज दर बढ़ाई इन्होंने।
जिंदगी की रेलगाड़ी,
कभी पा न सकी पटरी!---वाह्ह्ह  अपनों के लिए जीवन भर पिसता रहता है इंसान कितना भी करे उनकी अपेक्षाएँ बढ़ती ही रहती हैं मन के अंतर्द्वंद को बहुत सार्थक शब्द मिले हार्दिक बधाई इस सुन्दर प्रस्तुति पर आ० सुकुल जी 

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