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आज़ादी का भ्रम छलावा है

आज़ादी का भ्रम छलावा है

कौन यहाँ आज़ाद हो सका
खाली महज़ दिखावा है 
आज़ाद हो क्या तुम फर्जों से
या साँसों के कर्ज़ों से
धरा गगन जल वायु से
जी ली जो इस आयु से
जागीरों की जकड़न से
न्योछावर हुई धड़कन से
शुभाषीश  एहसानों से
दिल में पसरे मेहमानों से
ममता की उस ओस से
पालक के उस जोश से
सजी बंधी उस राखी से
शिराओं बहती साखी से
यगों के संचित ज्ञान से
स्वंयभू दम्भ अभिमान से
पल क्षण के कर्ज़ों का बंधन
पंचभूत  हरजों का  बंधन
अपनों ,सपनों से आज़ादी
कैसे किस को  मिलती  है
बेताल सी गठरी पीठ लदी
हर पल संग संग चलती है
आज़ादी का भ्र्म छलावा है
कौन यहाँ आज़ाद हो सका

खाली महज़ दिखावा है 

 

मौलिक व अप्रकाशित"

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 12, 2016 at 9:34am

बहुत अच्छी लगी आपकी प्रस्तुति आ०  अमिता जी हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2016 at 11:41pm

आदरणीया अमिताजी, विश्वास है, आपकी आमद बनी रहेगी. एक ऐतिहासिक हो गये नारे की तुकबन्दी रोचक है. 

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 26, 2016 at 11:41pm

आदरणीया अमिता जी, आपकी किसी पहली प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर. सादर 

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