For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लघुकथा- नफरत

अख़बार में प्लास्टिक की बोरी पर दीपक बेचते गरीब बच्चे की फोटो के साथ उस की दास्ताँ छपी थी. जिस ने अपने मेहनत से अमेरिका में एरोनाटिक्स इंजीनियरिंग में मुकाम हासिल किया था. उस फोटो को देख कर हार्लिक बोला , “ कितना गन्दा बच्चा है. इसे देख कर खाना खाने की इच्छा ही न हो.”

“ यदि मैं देख लू तो मुझे उलटी हो जाए,” लुनिक्स ने अपना तर्क दिया, “ मम्मा ! ये भारतीय बच्चे इतने गंदे क्यों होते हैं ? आप तो भारत में रही है ना. आप वहां कैसे रहती थी. ये तो नफरत के काबिल है.”

“ क्यों लुनिक्स ? मेहनत करना गलत है. फिर तुम ने इस की दास्ताँ भी पढ़ी नहीं है. ये कौन है ? क्या है ?”

“ नहीं मम्मा

 ! मैं तो गंदे लोगों से नफरत करता हूँ. इस की शक्ल भी देखना नहीं चाहता हूँ. दास्ताँ पढ़ना तो दूर की बात हैं.”

“ तब तो बेटा, तुम इस घर के मुखिया के उद्यम को कभी जान नहीं पाओगे .” कहते ही मम्मा ने रामायण से वही फोटो निकाल कर माथे से लगा लिया और आँखों से आंसू निकल गए.

                                   --------------------

०७/११/२०१५

 (मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 687

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Omprakash Kshatriya on November 9, 2015 at 6:01am
आदरणीय मोहन बेगोवाल जी आप ने बिलकुल सत्य बात कही है । जो गरीब से ऊपर उठ जाते हैं वे ही गरीबों से नफरत करते हैं । इस हेतु आप का हार्दिक आभार ।
Comment by Omprakash Kshatriya on November 9, 2015 at 5:58am
आदरणीय शेख उस्मानी जी आप ने मेरी लघुकथा की पुरी समीक्षा कर दी । इस के मूल भावों को खूबसूरती से पेश किया है । इस समीक्षात्मक सहृदयता के लिए आप का हार्दिक आभार । शुक्रिया ।
Comment by मोहन बेगोवाल on November 8, 2015 at 10:51pm

  अति सुंदर रचना , यहाँ भी गरीब घर के बच्चे जब किसी मुकाम पे पहुँच जाते है, उनके बच्चे भी ऐसे ही नफरत करते है 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 8, 2015 at 8:23pm
बहुत सुंदर कटाक्ष न सिर्फ विदेशी सोच बल्कि विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण करने वाले देशी लोगों पर। पूर्वाग्रह कितनी बुरी चीज है, बिना सदगुण समझे ,परखे नफरत के भाव मन में पालने की कुप्रवृित्ति पर रोशनी डालती रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय ओम प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश जी।
Comment by Omprakash Kshatriya on November 8, 2015 at 3:58pm
आदरणीय सतविंदर जी आप को लघुकथा सुंदर लगी । आभार आप का मेरी लघुकथा पर उपस्थिति होने तथा टिप्पणी देने के लिए ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 8, 2015 at 2:28pm
बहुत सुंदर आदरणीय ओमप्रकाश जी।हार्दिक बधाई
Comment by Omprakash Kshatriya on November 8, 2015 at 12:23pm
आदरणीय तेजवीर जी आप को लघुकथा पसंद आई और उस मेहनतकश मनुष्य की मेहनत सफल हो गई । उन समस्त मेहनतकश इंसान को मेरा सलाम और आप का आभार ।
Comment by TEJ VEER SINGH on November 8, 2015 at 10:18am

हार्दिक बधाई आदरणीय ओमप्रकाश  जी!आपकी  लघुकथा में इतनी गहनता से एक मेहनतकश मनुष्य का चित्रण बहुत मार्मिक बन पडा है!बहुत शानदार लघुकथा!

Comment by Omprakash Kshatriya on November 8, 2015 at 10:09am
आदरणीय राहिला जी आप का कहना एकदम दुरुस्त है । सभी लोगों की करनी व कथनी में अंतर होता है । अंदर कुछ और बाहर कुछ । यह आजकल का फैशन है । आभार आप का इन अमूल्य व अतुलनीय विचारों के लिए ।
Comment by Rahila on November 8, 2015 at 8:55am
बहुत बेहतरीन रचना आदरणीय ओम प्रकाश जी! ये तो विदेशियों के विचार है।यहांतोस्वदेशी लोग भी ऐसी ही धारणा रखते है । गरीबों से हमदर्दी रखने वालों के भी अंदर कुछ और, बाहर कुछ और की स्थिति बहुत करीब का अनुभव है । बहुत बधाई आपको इस सार्थक लेखन हेतु ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
10 hours ago
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
10 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
11 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
12 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
12 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्ताहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।"
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। क्रोध पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। साथ ही भाई अशोक जी की बात…"
21 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"   आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी सादर, धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती राजनीति में…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service