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जरा सा पास आकर देख तो लो----(ग़ज़ल)---मिथिलेश वामनकर

1222---1222---122

 

जरा सा पास आकर देख तो लो

कभी पलकें उठाकर देख तो लो

 

अगरचे तिश्नकामी गम बहुत है

उसे आँसू पिलाकर देख तो लो

 

चलो माना कि नाटक ख़त्म लेकिन

जरा परदा उठाकर देख तो लो

 

बहुत तीखी है उनकी बात लेकिन

उसे दिल से लगाकर देख तो लो

 

ख़ुदा का तब्सिरा करने से पहले

नया परबत बनाकर देख तो लो

 

दिवारें रात भर सुनती रहेंगी 

कोई किस्सा सुनाकर देख तो लो

 

वहीँ नीचे, ख़ुशी भी मुन्तजिर है

ढकी दौलत हटाकर देख तो लो

 

ये माना जिंदगी है कामयाबी

जरा रेटिंग घटाकर देख तो लो

 

यकीं मानो मेरे सिर पर कफ़न है 

मेरी गर्दन झुकाकर देख तो लो

 

मुहब्बत की फिरौती दिल करेगा

इसे बंधक बनाकर देख तो लो

 

कभी करना मेरी तनकीद लेकिन 

मेरी गज़लें उठाकर देख तो लो

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by amod shrivastav (bindouri) on October 20, 2015 at 10:23am
आप "औसत "*कर सकते है ।
Comment by मनोज अहसास on October 19, 2015 at 9:36pm
फ़साना लिख दिया है चासनी से
इसे तुम गुनगुनाकर देख तो लो

बहुत खूब सर
सादर
Comment by amod shrivastav (bindouri) on October 19, 2015 at 7:35pm
रेटिंग???
Comment by amod shrivastav (bindouri) on October 19, 2015 at 7:35pm
आ सर बेहद सुन्दर भाव है सादर बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 7:22pm

आदरणीया कांता जी, आपको ग़ज़ल पसंद आई जानकार ख़ुशी हुई. ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 19, 2015 at 7:20pm

आदरणीय जयनित भाई जी, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. सादर 

Comment by kanta roy on October 19, 2015 at 1:35pm
बहुत तीखी है उनकी बात लेकिन
उसे दिल से लगाकर देख तो लो..... वाह !!! बहुत खूब कही है आपने उनकी बात को दिल से लगाने की । बधाई आदरणीय मिथिलेश जी बहुत खूब गजल हुई है ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on October 19, 2015 at 9:52am
सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय मिथिलेश जी..

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