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‘गंगा‘, ‘यमुना‘ के तीर पर बैठे,

गंगा‘, ‘यमुना‘ के तीर पर बैठे,
टूटती जुड़ती लहरों के व्यतिकरण में,
तुझे देखा है कई लोगों ने।

और मैं ने, ‘बेबस‘ और ‘धसान‘ में गोता लगाते
बार बार इस पार से उस पार जाते, आते, हृदयंगम किया है।

जबकि अन्यों को तू गिरिराज की
तमपूर्ण खोहों में छिपा मिला।

मेरे निताॅंत एकान्तिक क्षणों में क्या
तू मेरे चारों ओर प्रभामंडल की तरह नहीं छाया रहा?

आज तुझे उनमें भी लयबद्ध पाया
जिन्हें लोग कहते हैं कुत्सित , घ्रणित और अस्पृश्य ।

तेरी विराटता और सूक्ष्मता का
ऐंसा आश्चर्यजनक मिश्रण
कर रहा है बार बार भ्रमित, तथाकथित
विद्वज्जनों को।

फिर भी वे, शान से....
बिना चकित हुए, तेरी माया पर
दिये जा रहे हैं लगातार..... व्याख्यान.....
ढकेल रहे हैं इस जगत को,
सत्य से पृथक,
मिथ्यात्व में।
28 जून 1986
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Dr T R Sukul on October 5, 2015 at 10:25am

बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपालनारायण श्रीवास्तवजी, यथार्थता की परख करने के लिए। वास्तव में , उसे मन की व्यापकता के सहारे अनुभव किये जाने का अभ्यास करना पड़ता है न कि व्याख्यानों के सहारे। कविता को  अनुमोदन करने के लिए एक  वार पुनः धन्यवाद।   

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 5, 2015 at 8:55am

आदरणीय आपने कई जगह  उसका  आभास -साक्षात्कार किया और सुन्दर शब्दों में ढाला .

Comment by Dr T R Sukul on October 3, 2015 at 10:26pm

बहुत धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पांडेजी  , कविता को पसन्द करते हुए  सार्थक टीप देने के लिये। 

Comment by Dr T R Sukul on October 3, 2015 at 10:24pm

बहुत धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारीजी , कविता के मर्म पर सार्थक टीप देने के लिये।
वास्तव में विद्वज्जन उसकी सर्वव्यापकता पर खूब व्याख्यान देते पाये जाते हैं परन्तु उसे कुछ स्थानों और आकारों में बाँध कर उस अनिर्वचनीय को सीमित कर के स्वयं भी भ्रमित होते हैं और अन्यों को भी भ्रमित करते हैं।

Comment by pratibha pande on October 3, 2015 at 6:27pm

बहुत गहन विचारों को लिए सार्थक प्रस्तुति हैआपको ह्रदय से बधाई आदरणीय Dr T.R.Sukul ji  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 3, 2015 at 5:13pm

आज तुझे उनमें भी लयबद्ध पाया
जिन्हें लोग कहते हैं कुत्सित , घ्रणित और अस्पृश्य ।

उसकी यही तो विराटता है की आज तक उसमे कोई वर्गीकरण जैसी दुर्भावना ने जन्म नहीं लिया उसकी यही विशेषता तो विद्व्द्जनो को उसकी गरिमा में लम्बे  चौड़े व्याख्यान देने को बाध्य करती हैं 

बहुत गहन अनुभव का एहसास कराती प्रस्तुति आ०  Dr T R Sukul जी बहुत बहुत बधाई आपको |

Comment by Dr T R Sukul on October 3, 2015 at 3:50pm

आभार एवं वहुत धन्यवाद महोदय , कविता की गंभीरता अनुभव करने के लिए। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:25pm

बहुत सही कहा आदरणीय ! सार्थक रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

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