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हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

जाने क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है

हो के दरिया जो समंदर से अदावत की है

खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना

हमने तलवारों के साये में इबादत  की है

अच्छे हमसाये की तालीम मिली हे हमको

हमने जाँ दे के पडोसी की हिफाज़त की है

आज आमाल ही पस्ती का सबब हैं वरना

हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है

दम मेरा कूच -ए -सरकार जाकर निकले

इस तमन्ना के सिवा कुछ भी न हसरत की है

     

(मौलिक एवम अप्रकाशित )

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Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 28, 2015 at 1:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया  धर्मेन्द्र जी 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 28, 2015 at 1:05pm

आदरणीय गिरिराज जी होसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 28, 2015 at 8:29am

आदरणीय हसरत भाई , लाजवाब गज़ल कही है , सभी अश आर बे मिसाल हैं । दिली मुबारक बाद आपको ।

दम मेरा कूच -ए -सरकार जाकर निकले   -- इस मिसरे की तक्तीअ फिर से कर लीजियेगा , बेबहर लग रहा है ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 26, 2015 at 10:26am
ख़ूबसूरत अश’आर हुए हैं शरीफ़ साहब। दाद कुबूल करें
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 26, 2015 at 10:24am
ख़ूबसूरत अश’आर हुए हैं शरीफ़ साहब। दाद कुबूल करें
Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 24, 2015 at 2:58pm

बहुत बहुत शुक्रिया मिथलेश जी ग़ज़ल का वजन ये हे 2122 1122 1122 22

बहर के नाम से वाकिफ नहीं हूँ बराए मेहरबानी आप बता दें ...........ज़ेहन में जो मिसरा आता हे उसका वज़न निकल कर ग़ज़ल कह लेता हूँ अब तक जो कुछ सीखा हे इसी मंच से सीखा हे 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 24, 2015 at 2:55pm

धन्यवाद् कांता जी 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 24, 2015 at 2:54pm

बहुत बहुत धन्यवाद गोपाल जी 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 24, 2015 at 2:53pm

bahut bahut shukriah aap sabhi ka 

ghazal ka wajan ye he.............2122 1122 1122 22........behar k naam se waqif nahin hoon 

bara e meharbani aap hazrat mujhe bhi bata dein ...zehan me jo misra aata he uska wazan nikal kar ghazal keh leta hoon 

Comment by kanta roy on September 24, 2015 at 1:20pm
खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको
हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है...... वाह !!! बहुत ही शानदार गजल हुई है आदरणीय हसरत जी । बधाई

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