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212 212 212 212

छन के रौजन से आती हुई रौशनी

ख़्वाब के कण उड़ाती हुई रौशनी

 

तीरगी से गुज़रती हुई फ़र्श पर

डर के पैकर बनाती हुई रौशनी

 

मैं किसी के तसव्वुर में खोया था और

आई दिल को जलाती हुई रौशनी

 

रात भर का जगा ग़म से बेज़ार दिल

और मुझको सताती हुई रौशनी

 

इस तग़ाफ़ुल से नाशाद हो मुझसे वो

रुठ के दूर जाती हुई रौशनी

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on August 3, 2015 at 2:16pm

आप सभी का तहेदिल से शुक्रिया

Comment by Nita Kasar on July 29, 2015 at 11:54am
बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय शिज्जु शकूर जी बधाई क़ुबूल करियें ।
Comment by Ravi Shukla on July 29, 2015 at 11:00am

आरणीय शिज्‍जू शकूर जी

उमदा ग़ज़ल के लिये दाद तो बनती है ..... आभार । 

Comment by Harash Mahajan on July 28, 2015 at 5:39pm

आदरणीय शिज्जु "शकूर"  जी बहुत उम्दा पेशगी है है आपकी | बहुत बहुत बधाई | साभात |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 28, 2015 at 12:33pm

आदरणीय शिज्जु भाईजी,शानदार ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर  दाद के क़ुबूल फ़रमाऐं .....

Comment by Samar kabeer on July 28, 2015 at 11:25am
जनाब शिज्जु "शकूर" जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

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