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ला रहा रवि पालकी

ला रहा रवि पालकी

 

 

खोल कर आकाश के पट

चल पड़ा है सारथी

खिल रहीं मदहोश कलियाँ

ला रहा रवि पालकी

 

भोर में ममता लुटाती

स्वर सजीली रागिनी

आ विराजा श्याम कागा

चल सखी-री जाग-री

 

प्रात का मंचन अनोखा

रश्मियाँ— अप्लावतीं

 

तृप्त तारक चल पड़े

विश्रांति की आगोश में

चाँदनी मुख ढक चली

सब आ गए यूं होश में

 

मौन सपनों को सजाने

चल पड़े सब भारती

 

खिल रहीं हैं पराग कनिका

गा रहे अलि राग में

शीतल मलय बहने लगी

झरने झरे अनुराग में

 

उद्घोष अपना कर रही

भारती उषा जल गागरी

 

छोर अंबर का खुला

बहने लगा रंग लाल सा

बिहाग कुल हँसने लगे

सूरज जला है मशाल सा

 

बुझ गए नभ दीप सारे

पनघट चलीं सब ग्वालिनी ॥

मौलिक व अप्रकाशित

कल्पना मिश्रा बाजपेई  

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Comment

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Comment by kalpna mishra bajpai on August 11, 2015 at 6:23pm
आदरणीया नीरज शर्मा जी आपका आभार /सादर
Comment by Dr. (Mrs) Niraj Sharma on July 26, 2015 at 4:49pm

बहुत सुन्दर गीतिका छंद में लिखा गीत।  भोर का सजीव चित्रण हो आया निगाहों के सामने रचना को पढ़ते हुए। बहुत खूब साधुवाद आ kalpna mishra bajpai . जी।

Comment by kalpna mishra bajpai on July 23, 2015 at 5:28pm

आदरणीय maharshi tripathi जी आपका आभार 

मैं आपके पूछे गए प्रश्नों के अर्थ  लिख रही हूँ 

रश्मियाँ— अप्लावतीं,= सूर्य की किरणें सुनहरे रंग से भरी है 

आप्लावित = भरा हुआ 

विश्रांति =आराम कि शांति में 

पराग कनिका= पुष्प के मध्य में पीले रंग के सूक्ष्म कण । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 5:18pm

आदरणीया कल्पना मिश्रा बाजपाई जी, मेरे कहे के अनुमोदन हेतु आभार.

यह भी है कि इस मंच की अन्यान्य प्रस्तुतियां एवं रचनाकार भी आपकी अमूल्य राय की प्रतीक्षा में  है. कृपया उन पर अपनी अमूल्य राय देने की कृपा करे. सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 23, 2015 at 5:10pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आपका आभार 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 23, 2015 at 5:09pm

आदरणीय kanta roy  जी आपका हार्दिक आभार 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 23, 2015 at 5:09pm

आदरणीय Samar kabeer जी आपका सादर आभार 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 23, 2015 at 5:08pm

आदरणीय Manoj kumar Ahsaas जी आपने सही कहा कि सूर्य का रथ होता है और सारथी चलता हैं 

खोल कर आकाश के पट

चल पड़ा है सारथी

खिल रहीं मदहोश कलियाँ

ला रहा रवि पालकी...........................इन पंक्तियों में सारथी का जिक्र हुआ है ,और ला  रहा रवि का आशय है कि उसके साथ पालकी आ रही है । उम्मीद है आप समझ सकोगे /सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 1:16pm

आदरणीया कल्पना जी,इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by kanta roy on July 23, 2015 at 1:16pm
अद्भुत सी रचना लगी मुझे .... गाते हुए रवि पालकी ......... सुंदर शब्दों का संयोजन ..... भोर की उजास लिए रवि की सानिध्य में मानों वातावरण ही काव्यमय हो रहा है । बधाई आदरणीया कल्पना मिश्रा बाजपेयी जी

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