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" इतने पैसे नहीं हैं मेरे पास , सोच समझ कर माँगा और खर्च किया करो ", पति की आवाज़ उसके मन को मथ रही थी | काश उसने भी नौकरी की होती तो आज पार्टी के लिए पैसे मांगने की नौबत तो नहीं आती | यही सब सोचती किचन की ओर बढ़ी थी कि अचानक उसके कदम ठिठक गए | दरवाजे से उसकी नज़र पड़ गयी थी कामवाली पर जो नीचे रखे प्लेट्स में से निकाल कर पूरी वगैरह अपने पल्लू में बांध रही थी |
फिर उसने एक प्लेट में ढेर सारा खाने का सामान रखा और थोड़ी दूर से आवाज़ लगायी " बाई , ये प्लेट भी धुलने में रख देना "|
उसे बाई को सीधे खाना देना पता नहीं क्यों ठीक नहीं लगा |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 20, 2015 at 12:43pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी , लघुकथा के मर्म ने आपको छुआ , ह्रदय से धन्यवाद आपको.

Comment by विनय कुमार on July 20, 2015 at 12:41pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी ..

Comment by विनय कुमार on July 20, 2015 at 12:41pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 19, 2015 at 9:43pm

कमाल ...कमाल...कमाल 

लाज़वाब लघुकथा आदरणीय विनय जी. 

गज़ब लिखा है आपने झन्नाटेदार 

चकित हूँ .... बहुत बहुत धन्यवाद इस प्रस्तुति हेतु 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 19, 2015 at 8:02pm

बहुत ही सुन्दर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण !

Comment by Omprakash Kshatriya on July 19, 2015 at 10:27am

वाह नायिका  को भीख मांगना और देना - दोनों को बुरा मानना अच्छा लगा. बधाई इस मनोविशालेश्नात्मक  लघुकथा के लिए.

Comment by विनय कुमार on July 17, 2015 at 8:10pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया सविता मिश्रा जी..

Comment by savitamishra on July 17, 2015 at 7:09pm
  1. अपना स्वाभिमान मात खाता हैं तो दूजे के स्वाभिमान का भी ख्याल आने लगता हैं...बहुत बढ़ोया कथा
Comment by विनय कुमार on July 17, 2015 at 2:44pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी..

Comment by मनोज अहसास on July 17, 2015 at 11:25am
बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति
बधाई
सादर

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