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वफ़ाओं का मेरी सिला दीजिये
हूँ बेहोश मुझको जिला दीजिये


हुआ हूँ मैं गुम इस ज़माने में लेकिन
मुझी को मुझी से मिला दीजिये


कुचलते रहे हैं सदा हर कली को
किसी फूल को अब खिला दीजिये


मिला इस ज़माने में हर कोई खारा
ज़रा अब अमिय भी पिला दीजिये


सज़ा तो बहुत मिल गयी है मुझे अब
वो ख़्वाबों की मंज़िल दिला दीजिये

वफ़ाओं का मेरी सिला दीजिये 
हूँ बेहोश मुझको जिला दीजिये !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 515

Comment

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Comment by विनय कुमार on July 12, 2015 at 10:01pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सुनील जी..

Comment by shree suneel on July 12, 2015 at 9:46pm
बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीय. बधाई आपको इस प्रस्तुति पर. सादर.
Comment by विनय कुमार on July 9, 2015 at 7:45pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय परी श्लोक जी.

Comment by Pari M Shlok on July 9, 2015 at 3:11pm
बहुत खुबसूरत गजल

कुचलते रहे हैं सदा हर कली को
किसी फूल को अब खिला दीजिये (वाह )
Comment by विनय कुमार on July 9, 2015 at 12:10am

बहुत बहुत आभार आदरणीय राहुल डांगी जी ..

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 11:11pm
बहुत सुन्दर आदरणीय
Comment by विनय कुमार on July 8, 2015 at 10:35pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुनील प्रसाद जी , इस तरह भी सुन्दर है | सादर .

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 8, 2015 at 7:56pm
बहुत खुबसूरत गजल आदरणीय ज़रा इस तरह कहिये "वफाओं को मेरे सिला दीजिये
Comment by विनय कुमार on July 8, 2015 at 4:26pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी , सादर धन्यवाद..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 8, 2015 at 3:49pm

बढ़िया प्रस्तुति आदरणीय विनय जी 

बधाई स्वीकार कीजिये 

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