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यूँही दिन तमाम गुजर गए, यूँही शामें ख़ाली निकल गयी
तेरे फैसले ना बदल सके, मेरी आरज़ू ही बदल गयी

कभी बदगुमानी ने डस लिया,कभी बेबसी ने तबाह किया
कभी फ़र्ज़ ओ रिश्तों की बंदिशे,मेरी ख्वाइशो को कुचल गयी

यहाँ कुछ नहीं है वफ़ा हया,ये हवस का भूख का सिलसिला
तेरे साथ मैंने जो की कभी,मुझे नेकियां वो निगल गयी

मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है,तेरे हौसलो का जुनून भी
कोई बात शेरों में ढल गयी,कोई बात आँखों में जल गयी

यही फैसला ना हुआ कभी,के वो कल था सच या है आज सच
यूँ ही बेरुखी में दिमाग की, वो वफ़ा की उम्र निकल गयी


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on May 18, 2015 at 11:40pm
बहुत आभार मिथिलेश सर
कोई बात नहीं जो किसी का ध्यान नही गया
शायरी बेरुखी का हासिल है
आप हमेशा मेरा हौसला बढ़ाते है
ये ही बहुत है
आपका आभार पुनः
सबका आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 18, 2015 at 11:20pm

आदरणीय मनोज भाई जी बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

ना के स्थान पर कर ले क्योकि बह्र में उसका उच्चारण भी ही होगा. एक कठिन बह्र को आपने खूब निभाया है पता नहीं ये ग़ज़ल गुनीजनों की दृष्टि से कैसे छूट गई. शायद छंदोत्सव के आयोजन के समय पोस्ट हुई है ये ग़ज़ल. 

सादर 

Comment by Tanuja Upreti on May 16, 2015 at 10:12am
सुंदर उद्गारों के लिये बधाई
Comment by मनोज अहसास on May 15, 2015 at 10:58pm
शुक्रिया सर
Comment by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 9:41pm

मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है तेरे हौसलो का जुनून भी
कोई बात शेरों में ढल गयी कोई बात आँखों में जल गयी.....वाह ,रचना सुन्दर है आ .Manoj kumar Ahsaas जी , बधाई आपको , बाकी  इसके तकनीकी पक्ष पर  विद्व्जन जरूर प्रकाश डालेंगे ! सादर 

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