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रूतबा मंत्रालय का ( लघुकथा )

"समीर जी , क्या रूतबा है भई आपका ...!!! जहाँ भी जाते हो ..यार , छा जाते हो ! " --- अजय को गर्व था अपने दोस्त पर । समीर का जलवा तो उसके हर अंदाज़ से ही झलकता था। उसकी बातों से ही मंत्रालय में उसकी पद प्रतिष्ठा का अनुमान चल जाता है। जब साले साहब को मंत्रालय में जरूरी काम करवाने की जरूरत आन पडी तो अजय बडे गर्वित हो साले साहब के साथ मंत्रालय की ओर निकल लिए ।आजतक मंत्रालय के दर्शन भी नही किये थे उसने । दोस्त की मेहरबानी से यहाँ तक आने का अवसर भी प्राप्त हुआ । मन गदगद हुआ जा रहा था । मंत्रालय के अंदर प्रवेश करते ही सामने सुरक्षाकर्मी की पैनी नजर से अकबकाया हुआ अजय अपने आप को संभालता हुआ समीर जी का पता पूछा । सुरक्षाकर्मी का युँ उपेक्षित नजरों से उसे देखना अच्छा नही लगा जरा भी ....दोस्त को जरूर सुरक्षाकर्मियों के इस व्यवहार के बारे में बतायेगा ।

मन में गंथन मंथन करता हुआ साले साहब के साथ , जब निश्चित फ्लोर वे पहुँचे तो समीर जी की पूर्णरूपेण व्यक्तित्व से सामना हुआ।सामने की केबिन में समीर जी चाय का ट्रे हाथ में संभाले हुए अपने अधिकारी द्वारा निकम्मेपन की उपाधि से नवाज़े जा रहे थे ।



कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Shyam Narain Verma on May 16, 2015 at 11:32am
बहुत उम्दा , बधाई इस लघुकथा के लिए ..
Comment by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 10:14pm

आदरणीया कांता जी, सुन्दर रचना , बधाई आपको ! सादर  

Comment by annapurna bajpai on May 15, 2015 at 6:58pm

क्या बात है , सटीक व्यंग्य करती लघु कथा , जो बड़ी बड़ी ड़िंगे तो हाँकते है और असल मे वे कुछ और ही निकलते है । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 15, 2015 at 11:12am

बहुत खूब , आदरणीया कांता जी. कई बार ऐसी घटनाएं सामने आई है. जहाँ अंत में न दूध रहता है न पानी. बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति. हार्दिक बधाई आपको

Comment by aman kumar on May 15, 2015 at 10:35am

सरकार " होने का झूठा गर्व लोगो के मन से ज्ञ नही , जबकि भाव सेवक का होना जरूरी है , पर अँग्रेजी काल के  लाल काले चोंगे अभी तक लोगो के मन मे चड़े है , लोकतन्त्र मे भी ! 

आपकी कथा मानवीय कमजोरी की सुंदर अवभिव्यक्ति है ! 

Comment by Shubhranshu Pandey on May 15, 2015 at 9:33am

आदरणीया कान्ता जी, 

जो दिखता है वो होता नहीं के फ़लसफ़े को सुन्दर ढंग से पस्तुत किया है.

सरकार और सरकारी नौकरी के प्रति आग्रह के कारण ही ड्राइवर को साहब और पिउन को बाबू बना देता है.

सादर.

Comment by kanta roy on May 15, 2015 at 7:33am
आपका बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ,समाहारानालय से मंत्रालय तक सभी जगह यही हाल है । हाँ सही कहा आपने , हम भोपाली वल्लभ भवन से बडा सरोकार रखते है । आभार
Comment by kanta roy on May 15, 2015 at 7:20am
आभार तहे दिल से आदरणीया सविता मिश्रा जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 15, 2015 at 2:55am

आदरणीया कांता जी बहुत बढ़िया लघुकथा .... बहुत बहुत बधाई 

आपने वल्लभ भवन का चित्र  खींच दिया .....

Comment by savitamishra on May 14, 2015 at 10:41pm

बढ़िया दीदी ...बढचढ ऐसे ही बताते है लोग
सादर _/\_

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