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किसने कहा प्रेम अंधा होता है -- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

किसने कहा प्रेम अंधा होता है

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किसने कहा प्रेम अंधा होता है

रहा होगा उसी का , जिसने कहा

मेरा तो नहीं है

देखता है सब कुछ

वो महसूस भी कर सकता है

जो दिखाई नहीं देता उसे भी

वो जानता है अपने प्रिय की अच्छाइयाँ और

बुराइयाँ भी

वो ये भी जानता है कि ,

उसका प्रेम,  पूर्ण है ,

बह रहा है वो तेज़ पहाड़ी नदी के जैसे , अबाध

साथ मे बह रहे हैं ,

डूब उतर रहे हैं साथ साथ

व्यर्थ की भावनायें भी , कचरों के जैसे

प्रेम के साथ साथ, पर प्रेम से अलग

बिना भीगे उन व्यर्थ की भावनाओं से

जैसे कमल का पत्ता पानी रह के भी गीला नहीं होता

सब कुछ दिख रहा है , महसूस हो रहा है

उसे विश्वास है

सागर के प्रेम की पूर्णता पर भी

वो भी सब कुछ देखते हुये भी

समाहित कर लेगा खुद में,  सब कुछ के साथ

क्योंकि प्रेम होता है तो पूर्ण ही होता है

आधा अधूरा तो व्यापार होता हैं

******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 4, 2015 at 10:58am

आदरणीय जितेन्द्र भाई , सराहना के लिये आपका बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 4, 2015 at 10:58am

आदरणीय आशुतोष भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 4, 2015 at 10:43am

बहुत खूब, आदरणीय गिरिराज जी. आपकी द्वारा रचित इस गहन अभिव्यक्ति से हर तरह से स्पष्ट होता है कि प्रेम अँधा नहीं होता

.प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 2, 2015 at 9:04pm

आदरणीय भाई साब इक नया चिंतन देते इस शसक्त रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 9:25pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 1, 2015 at 9:13pm

अनुज

यह भी  एक अंदाज है . नजरिया है . बढ़िया है .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 8:53pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , मै एक ही बार पोस्ट किया हूँ , अप्रूभल के समय शायद क्लिक दो बार हो गया होगा । 

आदरणीय प्रधान सम्पादक जी से प्रार्थना  है कि एक पोस्ट को डिलिट करने की कृपा करें , जिसमें किसी पाठक की प्रतिक्रिया नही है ॥ 

                                                                                                                                                  ॥ सादर निवेदित ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 8:39pm

आदरणीय गिरिराज सर एक ही रचना दो बार पोस्ट हो गई है.

http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:649508

http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:649409

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