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देह में तृष्णा के सागर
रेशम में ढकी गागर
इत्र से दबी गंध
लहू के धब्बों में
धुन्दलाया चेहरा
मुखोटों के पीछे
छिपाया मोहरा
न कोई मंजिल
ना कोई पहचान
बैठ ऊँचे मचान पर
ढूंढे नये आसमान
बे-माईने वक़्त का ये जहान
प्रेम परिभाषा ढूँढता वासना में
तम के घेरे में घिरा इंसान !!

******************************************

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:50am

आदरणीय narendrasinh chauhan जी बहुत बहुत धन्यवाद ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:50am

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आपकी उपस्थिति और सराहना युक्त टिप्पणी के लिये आभार ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:48am

आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया जी हार्दिक आभार ...सादर 

Comment by shree suneel on April 28, 2015 at 1:17am
देह में तृष्णा के सागर
रेशम में ढकी गागर
इत्र से दबी गंध
लहू के धब्बों में
धुन्दलाया चेहरा
आदरणीय मोहन सेठी जी, इस सशक्त और गम्भीर रचना के लिए बधाई आपको.
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 27, 2015 at 6:43pm
प्रेम परिभाषा ढूँढता वासना में
तम के घेरे में घिरा इंसान !!
बहुत ही सही वर्णन , बधाई, आदरणीय मोहन सेठी जी , सादर।
Comment by narendrasinh chauhan on April 27, 2015 at 6:06pm

खूब सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 27, 2015 at 3:47pm
आदरणीय मोहन सेठी जी इस सुंदर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 27, 2015 at 12:34pm

सुंदर प्रस्तुति. बधाई .   पर न जाने क्यों अचानक रुक सी गई प्रतीत हो रही है

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