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२२२       /२२२          /२२२

हाँ ये हसीन काम हमने ही किया

खुद को तो तमाम हमने ही किया

आगाजे-बरबादी तेरा  करम

अंजाम इंसराम  हमने  ही किया                       (अंजाम इंसराम=अंजामिंसराम )  इंसराम = व्यवस्था

 

हुस्न पे तू सनम न कर यूँ गुमान

जहाँ में तेरा नाम हमने ही किया

रोज ये कहना कि न आयेंगे पर

कू पे तेरी शाम हमने ही किया

 

हर सुबह न मुँह को लगायेंगे कभी

और शाम-इंतजाम हमने ही किया                    (शाम इंतजाम=शामिंतजाम)

 

कौन गुजरता वरना ’जान’ यां से

इन मिसाल को गाम हमने ही किया

 

किसकी थी मजाल तंज जो करता

खुद को ‘जान’ निलाम हमने ही किया

******************************************

मौलिक व् अप्रकाशित (c) जान गोरखपुरी

******************************************

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 8:42pm

आदरणीय इंतज़ार सरजी हार्दिक आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 8:36pm

आदरणीय vijai सरजी हौसलाफजाई के लिए आभार!!

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 20, 2015 at 7:54am

वाह वाह बहुत खूब ....

हुस्न पे तू सनम न कर यूँ गुमान

जहाँ में तेरा नाम हमने ही किया

किसकी थी मजाल तंज जो करता

खुद को ‘जान’ निलाम हमने ही किया

आदरणीय कृष्णा जी बधाई ....सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 19, 2015 at 9:35pm
हाँ ये हसीन काम हमने ही किया
खुद को तो तमाम हमने ही किया
खूबसूरत ग़ज़ल, बधाई, प्रिय कृष्ण मिश्रा जी , सादर।

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