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“ माँ! तुम्हे भैया के फ्लेट से आये हुए, यहाँ मेरे पास दो महीने हो गये है. उनका फ्लेट काफी बड़ा भी है, कुछ महीने वहाँ रह आओ. आखिर! उन्हें आपकी कमी भी तो महसूस होती होगी “  

अचानक अपने कमरे में से निकलकर छोटे बेटे के इन उदारता भरे शब्दों को सुनकर, माँ को दो माह पहले बड़े बेटे की उदारता याद आ गई. आँखों में नमी लेकर अपने कपड़ो का बेग जमाते हुये उसे मन में दोनों बेटों के फ्लेट,  अपनी कोख से बहुत  ही छोटे लग रहे थे..

 

 जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)      

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 28, 2015 at 10:12am

आदरणीय डा.गोपाल जी. लघुकथा पर आपकी सराहना पाकर बहुत मनोबल मिलता हैआपका ह्रदय से आभार

सादर!

Comment by umesh katara on March 28, 2015 at 9:20am

बहुत खूब...मार्मिक चित्रण

Comment by बृजेश नीरज on March 28, 2015 at 7:09am
इस लघुकथा पर अभी और काम किए जाने की जरूरत है। इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by Shyam Mathpal on March 27, 2015 at 4:01pm


आ.जितेन्द्र पस्टारिया जी,

आ. सुंदर लघु कथा. बधाई .

Comment by विनय कुमार on March 27, 2015 at 1:49pm

वाह , मन को भिगो दिया आपने | बहुत सुन्दर लघुकथा , बहुत बहुत बधाई आदरणीय..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 27, 2015 at 12:05pm

वाह जीतू भाई

मर्म को पकडती  कथा और सुन्दर प्रस्तुति . सादर .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 27, 2015 at 11:37am

लघुकथा के मर्म को आपने छुआ, आपकी पाठकधर्मिता को नमन, आदरणीय मोहन जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 27, 2015 at 11:35am

रचना पर आपके आशीर्वाद के लिए, आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय डा.विजय जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 27, 2015 at 11:34am

आदरणीय मिथिलेश जी. आपकी उपस्थिति व् स्नेहिल सराहना के लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ. आपके मार्गदर्शन का बहुत-बहुत आभार, मैंने कुछ संसोधन किया है

सादर!

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 27, 2015 at 6:47am

आदरणीय दिल में चुभने वाले भाव भर दिये आपने चार लाइनों में ....

कृपया ध्यान दे...

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