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“ माँ! तुम्हे भैया के फ्लेट से आये हुए, यहाँ मेरे पास दो महीने हो गये है. उनका फ्लेट काफी बड़ा भी है, कुछ महीने वहाँ रह आओ. आखिर! उन्हें आपकी कमी भी तो महसूस होती होगी “  

अचानक अपने कमरे में से निकलकर छोटे बेटे के इन उदारता भरे शब्दों को सुनकर, माँ को दो माह पहले बड़े बेटे की उदारता याद आ गई. आँखों में नमी लेकर अपने कपड़ो का बेग जमाते हुये उसे मन में दोनों बेटों के फ्लेट,  अपनी कोख से बहुत  ही छोटे लग रहे थे..

 

 जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)      

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:47pm
आदरणीय मदनलाल जी, आपका हार्दिक आभार
सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:46pm
आदरणीय गिरिराज जी. लघुकथा आपका आशीर्वाद पाकर धन्य हुई
सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:45pm
आदरणीय निलेश जी. रचना पर आपके स्नेह हेतु आपका हार्दिक आभार

सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:44pm
आदरणीय धर्मेन्द्र सिंह जी, आपकी सराहना पाकर रचना धन्य हुई.आपका ह्रदय से आभार
सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:43pm
आदरणीय वीनस जी,लघुकथा पर आपकी उपस्थिति हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ
सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:41pm
प्रोत्साहित करती सराहना हेतु आपका हार्दिक ,आभार आदरणीया अर्चना त्रिपाठी जी
सादर!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 3, 2015 at 1:40pm
आदरणीय विवेक जी, आपका हार्दिक आभार
सदर!
Comment by Madanlal Shrimali on May 2, 2015 at 6:45pm
अंतिम पंक्तियों ने पूरी लघु कथा को संभाल लिया।
सुन्दर लघु कथा।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 2, 2015 at 6:29pm

क्या बात है . जितेन्द्र भाई , इस लघुकथा ने तो मौन ही कर दिया ! बहुत सुन्दर , हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2015 at 4:18pm

नि:शब्द हूँ 

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