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सब्जी वाला है वो

गरीब है 
पर स्वाभिमानी बहुत है 
सब्जी की ढकेल 
शहर की कोलोनियों में 
घुमाता है
जोर जोर से सब्जियों के
नाम की आबाज
लगाता है
आखिर में ले लो साहब
कहकर जरूर चिल्लाता है
कुछ आदतें हो गयी हैं
उस पर हावी
कल की सब्जियों को भी 
कह जाता है ताजी
कुछ सब्जियाँ
पूरी बिक चुकी होती हैं
उनका भी नाम पुकार जाता है
बीच बीच में पानी के छींटों से
सब्जियों को सँवार जाता है
ऊँचे लोगों की नीची हरकतों को 
बखूबी पहचानता है
लाखों कमाने वालों की 
रुपये दो रुपये की चिक चिक 
को जानता है
पाव सब्जी के बदले 
चार बातें सुना जाते हैं
ये ऊँचे लोग
पता नहीं फिर भी क्यों कहाते हैं 
ये ,ऊँचे लोग
माँ -बाबूजी ,भाई-भाभी
कोई तो नहीं रहता है इनके साथ
इसीलिये तो चार भिण्डियों से
बन जाती है बात
बडे लोगों की छोटी हरकतें 
सहन कर जाता है वो
क्योंकि रोज माँ-बाबूजी की दवाई 
लेकर घर जाता है वो
शाबाश !सब्जी वाले 
हकीकत में तो बडे लोगों से बडा है तू
लाख-गरीब होकर भी 
माँ-बाबूजी के साथ खडा है तू

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित





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Comment by Meena Pathak on March 26, 2015 at 9:00pm

हकीकत में तो बडे लोगों से बडा है तू
लाख-गरीब होकर भी 
माँ-बाबूजी के साथ खडा है तू....................भावपूर्ण रचना ..सादर बधाई 

Comment by Shyam Mathpal on March 26, 2015 at 8:50pm

आदरणीय उमेश कटारा जी,

समाज की एक सोच व तसबीर पेश की. हार्दिक बधाई.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 26, 2015 at 8:49pm

vah kataaraa jee

बेहतरीन रचना . सादर .

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on March 26, 2015 at 8:41pm
आदरणीय उमेश कटारा जी हृदय स्पर्शी रचना आपकी लेखनी से निकल आई है शुरू आत थोड़ी हल्की जरुर लगती है परन्तु आगे भारी भारी और भारी हो गई है।सादर निवेदन है"सब्जी की ( --- ) ढकेला कालोनियों....बीच में कुछ छूटा प्रतीत होता है ये मेरा भ्रम भी हो सकता है। नमन।

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